नई दिल्ली, 9 जनवरी (khabarwala24)। भारत सरकार ने कपड़ा उद्योग को बेहतर बनाने के लिए एक नई पहल शुरू की है, जिसका नाम ‘डिस्ट्रिक्ट-लेड टेक्सटाइल्स ट्रांसफॉर्मेशन’ (डीएलटीटी) है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत के वस्त्र क्षेत्र में समावेशी और टिकाऊ विकास को बढ़ावा देना है।
इसके तहत सरकार ने देश के 100 अधिक संभावनाओं वाले जिलों को वैश्विक निर्यात चैंपियन बनाने और 100 अति संभावनाओं वाले जिलों को आत्मनिर्भर केंद्रों के रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखा है।
असम के गुवाहाटी में आयोजित ‘राष्ट्रीय वस्त्र मंत्री सम्मेलन’ में वस्त्र मंत्रालय ने कहा कि अब वस्त्र क्षेत्र में जिला स्तर पर और विशेष क्षेत्र के अनुसार काम किया जाएगा। इसके लिए सभी जिलों का अध्ययन आंकड़ों पर आधारित मूल्यांकन प्रणाली से किया गया। इसमें तीन मुख्य बातों – निर्यात प्रदर्शन, एमएसएमई की स्थिति और कामगारों की उपलब्धता को देखा गया।
इस अध्ययन के आधार पर जिलों को दो भागों में बांटा गया है-चैंपियन जिले और आकांक्षी जिले। हर जिले की श्रेणी के अनुसार उसके लिए अलग-अलग योजनाएं और कार्य रूपरेखा तैयार की गई है, ताकि वहां का विकास सही दिशा में हो सके।
इस पहल में पूर्व और उत्तर-पूर्व भारत पर विशेष ध्यान दिया गया है। इन क्षेत्रों में जनजातीय क्षेत्रों का विकास, संपर्क सुविधाओं में सुधार और जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैग देने पर जोर दिया जाएगा। इससे यहां की खास हस्तशिल्प और वस्त्र उत्पादों को वैश्विक बाजार में ऊंची पहचान मिल सकेगी।
सरकार ने कहा कि इस योजना में सरकारी संसाधनों, उद्योगों और शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग किया जाएगा। इसका उद्देश्य वस्त्र समूहों को मजबूत करना और सफल मॉडलों को अन्य जिलों में भी लागू करना है, ताकि अधिक से अधिक लोगों को इसका लाभ मिल सके।
वस्त्र मंत्रालय ने गुवाहाटी में एक उच्चस्तरीय सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें उत्तर-पूर्व राज्यों में वस्त्र क्षेत्र के विकास पर चर्चा की गई। बैठक में नीतियों में तालमेल, निवेश बढ़ाने, कौशल विकास और बाजार तक पहुंच जैसे विषयों पर विचार किया गया।
केंद्रीय वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि उत्तर-पूर्व भारत देश के वस्त्र क्षेत्र का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है और सरकार इसके विकास के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
विचार-विमर्श के दौरान इस क्षेत्र की हथकरघा परंपरा, जीआई टैग वाले उत्पाद, विभिन्न प्रकार के रेशम, बांस से बने उत्पाद और महिला कारीगरों की भागीदारी को खास ताकत के रूप में बताया गया।
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