प्रयागराज, 26 जनवरी (khabarwala24)। माघ मेले में कल्पवास का विशेष महत्व होता है। भक्त सभी तरह के पापों से मुक्ति पाने और किसी गलती के पश्चाताप के लिए कल्पवास करते हैं।
माना जाता है कि कल्पवास के साथ शैय्या दान (सेझिया दान) करना भी जरूरी है। अब संगम के तट पर माघ महीने में भक्त कल्पवास के बाद शैय्या दान कर रहे हैं, जिसमें घर की हर जरूरत में इस्तेमाल होने वाली बड़ी से बड़ी वस्तु दान की जाती है।
कल्पवास और शैय्या दान पर दंडी स्वामी महेशाश्रम महाराज ने khabarwala24 से खास बातचीत में बताया कि माघ मेले में भक्त कल्पवास करने आते हैं और जो भक्त 12 साल का कल्पवास करता है, उसे 12 साल पूरे होने के बाद शैय्या दान करना चाहिए। शैय्या दान को ग्रंथों में पश्चाताप का दान कहा गया है, जिसका उद्देश्य है पापों का नाश करना और पुरानी गलतियों की माफी है। अगर 12 साल का कल्पवास कर लिया जाए तो जन्म और मृत्यु के फेर से मुक्ति मिल जाती है और जातक मोक्ष को प्राप्त हो जाता है।
तीर्थ पुरोहित प्रयागराज विनय मिश्रा ने कहा, “कल्पवास तभी पूरा माना जाता है जब शैय्या दान किया जाता है। यह पापों से मुक्ति दिलाने का मार्ग है, और हर साल भक्त माघ मेले में प्रयागराज आकर दान करते हैं। ये दान हर ब्राह्मण को लेने का अधिकार नहीं होता है। इसे कुल के पुरोहित ही ले सकते हैं, क्योंकि ये दान भी पापों का दान है। शैय्या दान में वो चीजें दी जाती हैं, जो सामान्य जन अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल करते हैं। पहले लोग 3, 5 और 12 साल का कल्पवास करते थे, लेकिन अब स्वास्थ्य को देखते हुए करते हैं।
बता दें कि कल्पवास में किया गया शैय्या दान बहुत महत्वपूर्ण दान होता है, जिसे पौष माह के 11वें दिन से प्रारंभ होकर माघ माह के 12वें दिन तक किया जा सकता है। कल्पवास में भक्त संगम के तट पर देवताओं का पूजन और ध्यान करते हैं और फिर दान देखकर कल्पवास की प्रक्रिया को पूरा किया जाता है। शास्त्रों में कल्पवास की न्यूनतम अवधि एक दिन, तीन दिन, तीन महीने, छह महीने, 2 साल, 3 साल और 12 साल की भी होती है।
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