अलवर के भपंग वादक गफरुद्दीन मेवाती जोगी को पद्मश्री, 38 साल की कला साधना का सम्मान

अलवर, 26 जनवरी (khabarwala24)। राजस्थान के अलवर निवासी प्रसिद्ध भपंग वादक गफरुद्दीन मेवाती जोगी को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा ने परिवार और स्थानीय समुदाय में खुशी की लहर दौड़ा दी है। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत सरकार द्वारा पद्म पुरस्कारों की घोषणा के साथ ही उनके घर पर बधाइयों का […]

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अलवर, 26 जनवरी (khabarwala24)। राजस्थान के अलवर निवासी प्रसिद्ध भपंग वादक गफरुद्दीन मेवाती जोगी को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा ने परिवार और स्थानीय समुदाय में खुशी की लहर दौड़ा दी है। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत सरकार द्वारा पद्म पुरस्कारों की घोषणा के साथ ही उनके घर पर बधाइयों का सिलसिला शुरू हो गया, जो देर रात तक जारी रहा।

गफरुद्दीन मेवाती जोगी मूल रूप से भरतपुर जिले (वर्तमान में डीग जिला) के कैथवाड़ा गांव के रहने वाले हैं। वे 1978 में अलवर आ बसे थे। उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि पद्मश्री जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजा जाएगा। उनकी कला के लिए उन्हें प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, राजस्थान सरकार, संगीत नाटक अकादमी और जिला स्तर पर कई पुरस्कार मिल चुके हैं, लेकिन पद्मश्री की घोषणा सबसे बड़ा सुखद अनुभव है।

उन्होंने khabarwala24 से बात करते हुए कहा, “मोदी सरकार आने के बाद ही पता चला कि पद्मश्री कोई अवॉर्ड होता है। पहले हमारे जैसे कलाकारों को ऐसा सम्मान नहीं मिला था।”

गफरुद्दीन मेवाती भगवान शिव के डमरू से प्रेरित पुश्तैनी वाद्य यंत्र ‘भपंग’ को बजाते आ रहे हैं। यह वाद्य यंत्र महाभारत कालीन दोहों, भर्तृहरि शतक और वैराग्य के दोहों को गुणगान करने के लिए जाना जाता है। वे ‘पांडुन का कड़ा’ (मेवाती भाषा में महाभारत गायन) के इकलौते जीवित गायक हैं। महाभारत के पांडव अज्ञातवास के दौरान विराटनगर (अलवर क्षेत्र) में रहने के प्रसंग को भपंग के साथ गाया जाता है।

उन्होंने 2,800 से अधिक लोक गीत और दोहे भपंग के साथ संरक्षित किए हैं, जिनमें से कई बॉलीवुड में कॉपी किए गए।

उनके पुत्र डॉ. शाहरुख खान मेवाती जोगी आठवीं पीढ़ी में भपंग वादन कर रहे हैं। शाहरुख ने मेवात संस्कृति पर पीएचडी की है और परिवार के छोटे बच्चे भी इस कला से जुड़े हैं।

गफरुद्दीन ने बताया कि 4 साल की उम्र से पिता के साथ भपंग बजाते थे। अलवर की गलियों में घर-घर जाकर आटा इकट्ठा करते थे, जिससे रोटी बनाकर जीवन यापन होता था। उन्होंने कहा, ‘पेट पालने का कोई अन्य साधन नहीं था।’

उनकी कला ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। 1992 में पहली विदेश यात्रा के बाद इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, पेरिस, दुबई सहित 60 से अधिक देशों में प्रस्तुति दी। लंदन में महारानी एलिजाबेथ के जन्मदिन पर भी भपंग वादन किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी कला की सराहना की और स्वच्छता मिशन से जोड़ा। कोरोना काल में भपंग के माध्यम से लोकगीत गाकर स्वच्छता संदेश दिया।

घोषणा के समय गफरुद्दीन अलवर के सूचना केंद्र में ‘वंदे मातरम’ की 150वीं वर्षगांठ पर प्रदर्शनी के उद्घाटन में भपंग वादन कर रहे थे। उसी दौरान गृह मंत्रालय से फोन आया। शुरू में लगा मजाक है, लेकिन घोषणा के साथ खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

उन्होंने कहा, “यह मजदूर की तरह है। सुबह मजदूरी करता है, शाम को मजदूरी मिलती है। वही खुशी आज मिल रही है। पद्म श्री मिलना ऐसे साबित हो रहा है, जैसे सुबह कोई मजदूर मजदूरी करने जाता है और शाम को उसे मजदूरी का पैसा मिलता है। इस पर जो खुशी के भाव होते हैं, वही खुशी आज मिल रही है। ऐसे तो मैं कई बार सम्मानित किया गया हूं, लेकिन पद्म श्री अवॉर्ड पाना एक सबसे बड़ी सफलता रही।”

उन्होंने बताया, “मैं 2016 तक पद्म श्री के बारे में नहीं जानता था और जब इसके बारे में जानने लगा तो इसके लिए आवेदन किया। पिछले तीन साल से लगातार आवेदन कर रहा था और आज मुझे खुशी का ठिकाना नहीं रहा।”

उन्होंने बताया कि उनके परिवार में उनका भाई और उनके बेटे भी इसी कला से जुड़े हुए हैं और इस कला का प्रदर्शन करते हैं। सरकार से भी अब हमें यह उम्मीद है कि हमें निशुल्क जमीन दी जाए, जहां हम लोक कलाओं से संबंधित एक स्कूल खोलें, जहां लोक कलाओं को पुनर्जीवित किया जा सके, क्योंकि अब युवा पीढ़ी उस विद्या को नहीं जानती और न ही उस विधा से उसका वास्ता है।

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