नई दिल्ली, 1 जनवरी (khabarwala24)। साल था 2018 और तारीख थी 2 जनवरी… जब उर्दू शायरी की दुनिया में अजीब सी खामोशी छा गई। इस दिन उस शख्स ने दुनिया को अलविदा कह दिया, जिसकी आवाज ने मुशायरों को रौशन किया, जिसकी कलम ने संस्कृत के श्लोकों को उर्दू के शेरों में ढाला। उस शख्स ने साहित्य को सामाजिक सौहार्द का जरिया बनाया और उनका नाम था अनवर जलालपुरी।
उत्तर प्रदेश के जलालपुर में 6 जुलाई 1947 को जन्मे अनवर जलालपुरी की प्रतिभा बचपन से ही झलकने लगी थी। एक छोटे कस्बे से निकलकर साहित्य के विशाल संसार तक उनका सफर साधना से भरा रहा। आजमगढ़ में शुरुआती शिक्षा और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में साहित्यिक परिपक्वता ने उनके भीतर के शायर को आकार दिया। वे हमेशा अपने उस्ताद मलिकजादा मंजूर अहमद के प्रति कृतज्ञ रहे, जिनका मार्गदर्शन उनकी रचनात्मक यात्रा की नींव बना।
साल 1963 में जलालपुरी ने मुशायरों में शिरकत शुरू की और जल्द ही अपनी अनूठी ‘निजामत’ के लिए पहचाने जाने लगे। मंच पर उनकी मौजूदगी मुशायरों को सिर्फ आयोजन नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव बना देती थी। शब्दों की प्रस्तुति और भावों की पकड़ ने उन्हें मुशायरों की जान बना दिया। यही कारण था कि उनकी लोकप्रियता साहित्यिक दायरों से निकलकर आम जन तक पहुंची। उनकी साहित्यिक साधना का सबसे उल्लेखनीय अध्याय श्रीमद् भगवद् गीता का उर्दू में काव्यात्मक अनुवाद है। गीता के 700 श्लोकों को संस्कृत से उर्दू के शेरों में पिरोना केवल अनुवाद नहीं था, बल्कि यह सांस्कृतिक संवाद का एक दुर्लभ उदाहरण बना। ‘उर्दू शायरी में गीता’ के रूप में पहचाने जाने वाले इस काम ने उन्हें सामाजिक सौहार्द का प्रतीक बना दिया। इसके साथ ही उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर की ‘गीतांजलि’ और कुरान के 11वें पारा का भी उर्दू में अनुवाद किया।
अनवर जलालपुरी सिर्फ एक शायर नहीं थे। वे नरेन्द्रदेव इंटर कॉलेज, जलालपुर में अंग्रेजी के व्याख्याता रहे। उन्होंने लेखन और अध्यापन को समान निष्ठा से निभाया। उत्तर प्रदेश हज कमेटी और उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी के सदस्य रहते हुए उन्होंने उर्दू भाषा के लिए संस्थागत स्तर पर भी काम किया। वे उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष बने और आगे चलकर राज्य मंत्री के पद तक पहुंचे, लेकिन उनकी पहचान साहित्य से बनी।
उनकी शायरी में प्रेम, दर्शन और देशभक्ति का एक ऐसा संगम है, जो पाठक को सोचने पर मजबूर करता है। ‘रहरौ से रहनुमा तक’, ‘रोशनाई के सफीर’, ‘खरे पानीयों का सिलसिला’, ‘खुशबू की रिश्तेदारी’, ‘जागती आंखें’ और नातिया शायरी पर उनकी चार पुस्तकें, ये सब उनके साहित्यिक विस्तार का प्रमाण हैं। ‘अपनी धरती अपने लोग’ में उनका गद्य भी उतनी ही आत्मीयता से बोलता है। वे कई अखबारों और पत्रिकाओं के नियमित लेखक रहे और टीवी सीरियल ‘अकबर द ग्रेट’ के लिए संवाद भी लिखे।
अनवर जलालपुरी को ‘यश भारती’ सम्मान से नवाजा गया और सामाजिक सौहार्द में अभूतपूर्व योगदान के लिए मरणोपरांत ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया गया। ये सम्मान उनकी उस विरासत पर मुहर हैं, जो शब्दों के जरिये इंसानों को जोड़ती हैं। 2 जनवरी 2018 को लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के ट्रॉमा सेंटर में उनका निधन हो गया।
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