तिरंगे की रोशनी से जगमगाया महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर, ओम का प्रकाश चिन्ह बना विशेष आकर्षण

उज्जैन, 26 जनवरी (khabarwala24)। 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाया जा रहा है। देश के कोने-कोने में तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इस मौके पर उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर को विशेष रूप से सजाया गया है।उज्जैन के श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर को तिरंगे की रोशनी से सजाया गया। […]

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उज्जैन, 26 जनवरी (khabarwala24)। 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाया जा रहा है। देश के कोने-कोने में तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इस मौके पर उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर को विशेष रूप से सजाया गया है।

उज्जैन के श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर को तिरंगे की रोशनी से सजाया गया। रात के समय मंदिर का शिखर केसरिया, सफेद और हरे रंग की लाइटों से जगमगाया। यह सजावट देश के राष्ट्रीय ध्वज का प्रतीक है। शिखर पर बना ओम का प्रकाश चिन्ह श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण रहा।

इसके साथ ही, प्रातःकाल होने वाली विश्व प्रसिद्ध भस्म आरती के दौरान भगवान महाकाल का पंचामृत अभिषेक किया गया। विशेष पर्व के उपलक्ष्य में बाबा का भव्य और आकर्षक शृंगार किया गया, जिसमें सबसे खास रहा उनके मस्तक पर सुशोभित ‘तिरंगा तिलक’।

राष्ट्रभक्ति के रंगों में रंगे बाबा के इस स्वरूप ने श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। भस्म आरती के पश्चात महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा महाआरती संपन्न की गई। इस दिव्य दर्शन से पूरा मंदिर परिसर ‘जय श्री महाकाल’ के साथ ‘भारत माता की जय’ के उद्घोष से गूंज उठा।

श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में भस्म आरती का विशेष धार्मिक और पौराणिक महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भस्म आरती के दौरान भगवान महाकाल निराकार स्वरूप में होते हैं, इसीलिए महिलाएं इस आरती में शामिल नहीं होती हैं। महिलाएं सिर पर घूंघट या ओढ़नी डालकर ही दर्शन करती हैं।

इस परंपरा का मंदिर में सख्ती से पालन किया जाता है।

उज्जैन के लोगों में उस वक्त खुशी की लहर दौड़ गई, जब पद्मश्री-2026 की घोषणा में शहर के वरिष्ठ पुरातत्वविद् (आर्कियोलॉजिस्ट) डॉ. नारायण व्यास का नाम शामिल किया गया। डॉ. नारायण व्यास ने उज्जैन ही नहीं, बल्कि पूरे मालवा अंचल की प्राचीन विरासत को देश और दुनिया के सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके शोध कार्यों के माध्यम से कई ऐतिहासिक स्थलों की पहचान को नई दिशा मिली है, वहीं सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण और उनके महत्व को लेकर समाज में जागरूकता भी बढ़ी है।

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