गुप्त नवरात्रि : 900 साल से भी पुराना तंत्र, मंत्र और यंत्र की अधिष्ठात्री त्रिपुर सुंदरी का मंदिर, 51 शक्तिपीठों में एक

जयपुर, 20 जनवरी (khabarwala24)। शक्ति और दस महाविद्याओं की आराधना को समर्पित गुप्त नवरात्रि का तीसरा दिन बुधवार को है। इस दिन मां त्रिपुर सुंदरी की विशेष आराधना और पूजन का विधान है। हिंदू धर्म में गुप्त नवरात्रि को तांत्रिक और गुप्त साधना का समय माना जाता है, जिसमें देवी के विभिन्न रूपों की उपासना […]

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जयपुर, 20 जनवरी (khabarwala24)। शक्ति और दस महाविद्याओं की आराधना को समर्पित गुप्त नवरात्रि का तीसरा दिन बुधवार को है। इस दिन मां त्रिपुर सुंदरी की विशेष आराधना और पूजन का विधान है। हिंदू धर्म में गुप्त नवरात्रि को तांत्रिक और गुप्त साधना का समय माना जाता है, जिसमें देवी के विभिन्न रूपों की उपासना की जाती है।

देश में देवी के ऐसे कई मंदिर हैं, जहां दर्शन से श्रद्धालुओं को आत्मिक शांति मिलती है और हर मनोकामना पूरी होती है। ऐसा ही शक्ति का अद्भुत मंदिर राजस्थान के बांसवाड़ा में स्थित है, जिसे त्रिपुर सुंदरी मंदिर कहते हैं। यह 900 साल से भी पुराना सिद्ध शक्तिपीठ है। मंदिर में काली, सरस्वती और लक्ष्मी के दर्शन होते हैं। यहां की साधना शीघ्र फलदायी मानी जाती है।

मां त्रिपुर सुंदरी की मूर्ति श्री यंत्र पर स्थापित है। इसी कारण यहां देवी की मूर्ति में विशेष तेज और दिव्य प्रकाश दिखाई देता है। श्री यंत्र को देवी की शक्ति का सबसे शक्तिशाली प्रतीक माना जाता है।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार त्रिपुर सुंदरी तंत्र, मंत्र और यंत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। यह स्थान न केवल एक सिद्ध शक्तिपीठ है, बल्कि 64 योगिनियों में से एक का भी केंद्र है। यहां की गई साधना और पूजा बहुत जल्दी फलदायी सिद्ध होती है। राज राजेश्वरी मां त्रिपुर सुंदरी का यह मंदिर लगभग 900 साल पुराना है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार यह 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहां देवी सती का पीठासन गिरा था। मंदिर में एक साथ तीन देवियों मां काली, मां सरस्वती और मां लक्ष्मी के दर्शन होते हैं, इसी वजह से इन्हें त्रिपुर सुंदरी कहा जाता है।

त्रिपुर सुंदरी मंदिर की एक खासियत यह भी है कि यहां का काला पत्थर बहुत विशेष है। इसी प्रकार का पत्थर अयोध्या में भगवान श्री राम की मूर्ति के लिए इस्तेमाल किया गया।

त्रिपुर सुंदरी मंदिर का निर्माण पांचाल जाति के चांदा भाई लुहार ने करवाया था। कथा के अनुसार पास ही खदान में लौह अयस्क निकाला जाता था। किंवदंती है कि देवी भिखारिन बनकर आईं, लेकिन पांचालों ने अनदेखा किया। क्रोधित होकर देवी ने खदान ध्वस्त कर दी। माफी मांगकर पांचालों ने मंदिर और तालाब बनवाया। 16वीं शताब्दी में फिर जीर्णोद्धार हुआ। आज भी पांचाल समाज ही मंदिर की देखभाल करता है।

यह प्रसिद्ध पीठ राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में स्थित है। बांसवाड़ा मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर तलवाड़ा गांव के पास यह मंदिर है। शुरुआत में इसे तारताई माता के नाम से जाना जाता था। बांसवाड़ा दक्षिणी राजस्थान में अरावली पर्वतमालाओं से घिरा हुआ क्षेत्र है, जो नदियों, तालाबों और प्राकृतिक सौंदर्य से भरा हुआ है। इसे वागड़ क्षेत्र कहा जाता है और प्राचीन काल से ही यह धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र रहा है।

खास बात है कि बांसवाड़ा को मिनी काशी भी कहा जाता है। यहां कई प्राचीन मंदिर हैं, जो अपनी शिल्पकला, वास्तुकला और भव्यता के कारण पूरे देश में प्रसिद्ध हैं। पुराणों में इस क्षेत्र को पवित्र भूमि माना गया है। विभिन्न प्राचीन ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। स्कंदपुराण में इसे ‘गुप्त प्रदेश’ कहा गया है। राजा भोज के शिलालेखों में ‘स्थली मंडल’ और पुराणों में ‘कुमारिका खंड’ और ‘वागुरी क्षेत्र’ कहा गया।

इस क्षेत्र से बहने वाली माही नदी को पुराणों में ‘कलियुगी माही गंगा’ कहा गया है। संतों और ऋषियों ने यहां तीन नदियों के संगम की महिमा बताई है और माही नदी में स्नान को बहुत पवित्र माना है। माता का हर दिन श्रृंगार होता है और दिन के हिसाब से उसी रंग के वस्त्र और फूल भी चढ़ाए जाते हैं।

गुप्त नवरात्रि, नवरात्रि के साथ ही सामान्य दिनों में भी बड़ी संख्या में भक्त दर्शन करने और माता का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए यहां आते हैं। मान्यता है कि शक्ति के दर्शन करने से तंत्र-मंत्र साधना, आध्यात्मिक उन्नति और मनोकामनाओं की पूर्ति शीघ्र होती है।

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