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पूर्व राजदूत और वरिष्ठ अधिकारियों ने उठाए यूएससीआईआरएफ की रिपोर्ट पर सवाल, बताया तथ्यों से परे और पक्षपातपूर्ण

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नई दिल्ली, 22 मार्च (khabarwala24)। अमेरिकी संस्था ‘यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम'(यूएससीआईआरएफ) की हालिया रिपोर्ट पर भारत के 275 पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। विरोध जताने वालों में 25 सेवानिवृत्त न्यायाधीश, 119 पूर्व नौकरशाह (जिनमें 10 राजदूत शामिल हैं) और 131 पूर्व सैन्य अधिकारी शामिल हैं।

इन सभी हस्ताक्षरकर्ताओं ने संयुक्त वक्तव्य में यूएससीआईआरएफ की रिपोर्ट को भ्रामक और तथ्यों से परे बताया है। उनका तर्क है कि धार्मिक स्वतंत्रता जैसे संवेदनशील विषय का मूल्यांकन केवल कुछ चुनिंदा घटनाओं के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। इसके बजाय, किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले दीर्घकालिक जनसांख्यिकीय आंकड़ों का व्यापक विश्लेषण अनिवार्य है।

हस्ताक्षरकर्ताओं की ओर से जारी पत्र में 1947 के विभाजन के समय के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि उस समय अविभाजित पाकिस्तान (जिसमें आज का बांग्लादेश भी शामिल था) में हिंदू आबादी लगभग 20.5 प्रतिशत थी। हालांकि, आज के समय में पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी घटकर करीब 1.5-2 प्रतिशत रह गई है, जबकि बांग्लादेश में यह करीब 7-8 प्रतिशत है। 1951 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में हिंदू आबादी 20-22 प्रतिशत के आसपास थी, जो अब काफी कम हो चुकी है।

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पत्र में कहा गया कि 1971 में बांग्लादेश के अलग होने के बावजूद, दोनों देशों में हिंदू अल्पसंख्यकों की आबादी में लगातार गिरावट एक गंभीर चिंता का विषय है, जिसे अकादमिक और नीति स्तर पर भी स्वीकार किया गया है।

इसके विपरीत, भारत की स्थिति को अलग बताते हुए हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा कि यहां अल्पसंख्यक समुदायों की आबादी में स्थिरता या वृद्धि देखने को मिली है। आधिकारिक जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, भारत में मुस्लिम आबादी 1951 में 9.8 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में 14.2 प्रतिशत हो गई। वहीं, ईसाई समुदाय की आबादी 1951 से 2011 तक लगभग 2.3 प्रतिशत के आसपास स्थिर रही, जबकि सिख समुदाय की हिस्सेदारी 1.79 प्रतिशत से थोड़ी घटकर 1.72 प्रतिशत रही।

पत्र में कहा गया कि ये आंकड़े दिखाते हैं कि भारत में ऐसा कोई व्यवस्थित दबाव या उत्पीड़न नहीं है, जिससे अल्पसंख्यकों की आबादी में लगातार गिरावट हो।

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हस्ताक्षरकर्ताओं ने यूएससीआईआरएफ पर यह आरोप भी लगाया कि वह बिना पर्याप्त और ठोस प्रमाण के भारत की संस्थाओं और सामाजिक संगठनों, खासकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), को अक्सर नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा कि किसी भी संगठन की आलोचना तथ्यों और संदर्भ के आधार पर होनी चाहिए, न कि सामान्यीकृत धारणाओं पर।

पत्र में भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताते हुए कहा गया कि यहां मजबूत न्यायिक व्यवस्था, सक्रिय लोकतांत्रिक संस्थाएं और संसदीय निगरानी मौजूद है, जिससे किसी भी व्यक्ति या संगठन को धार्मिक अधिकारों के उल्लंघन पर बच निकलने की गुंजाइश बहुत कम है।

इसके साथ ही आरएसएस के बारे में कहा गया कि 1925 में स्थापित यह संगठन पिछले 100 वर्षों से ग्रामीण विकास, महिला सशक्तीकरण, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में लगातार सेवा कर रहा है। दुनिया भर में इसके प्रेरित संगठन आपदा राहत और सामाजिक सेवा में भी सक्रिय हैं।

यूएससीआईआरएफ की उन सिफारिशों की कड़ी आलोचना की गई, जिनमें भारत के नागरिकों पर प्रतिबंध लगाने और आरएसएस से जुड़े लोगों की संपत्तियां फ्रीज करने जैसी बातें कही गई हैं। हस्ताक्षरकर्ताओं ने इसे प्रेरित और असंतुलित बताते हुए अमेरिकी सरकार से इस रिपोर्ट में शामिल लोगों की पृष्ठभूमि की जांच कराने की मांग की है। इस पत्र के समन्वयक पूर्व राजदूत भास्वती मुखर्जी और पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव एम. मदन गोपाल हैं।

बता दें कि यूएससीआईआरएफ अमेरिकी सरकार की एक स्वतंत्र, द्विदलीय सलाहकार संस्था है, जो दुनिया भर में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति पर सालाना रिपोर्ट जारी करती है। यह रिपोर्ट मुख्य रूप से धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा, भेदभाव और सरकारी नीतियों की आलोचना करती है।

इस बार की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सरकार राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ व्यापक उत्पीड़न और हिंसा पर ठोस कदम नहीं उठा रही है। रिपोर्ट में कहा गया कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के मताधिकार को लेकर भी भारत सरकार के नियम भेदभावपूर्ण हैं। रिपोर्ट में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम और विभिन्न राज्य स्तरीय धर्मांतरण विरोधी और गोहत्या विरोधी कानून का जिक्र किया गया है।

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