वाशिंगटन, 23 जनवरी (khabarwala24)। अमेरिका के दो वरिष्ठ डेमोक्रेट लॉमेकर्स ने टेक दिग्गज कंपनी मेटा और गूगल पर गंभीर आरोप लगाए हैं। सांसदों का कहना है कि अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (डीएचएस) और उसकी एजेंसी इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (आईसीई) इन प्लेटफॉर्म्स पर ऐसे विज्ञापन चला रही है, जिनमें श्वेत राष्ट्रवादी विचारधारा और भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है।
हाउस ज्यूडिशियरी कमेटी की उपाध्यक्ष बेका बैलिंट और इमिग्रेशन प्रवर्तन की निगरानी करने वाली उपसमिति की प्रमुख, भारतीय मूल की सांसद प्रमिला जयपाल ने मेटा और गूगल के सीईओ को अलग-अलग पत्र भेजे हैं। इन पत्रों में उन्होंने मांग की है कि डीएचएस के साथ डिजिटल विज्ञापन से जुड़ी सभी साझेदारियां तुरंत खत्म की जाएं और यह बताया जाए कि कंपनियों के बीच समझौते का दायरा और अवधि क्या है।
सांसदों का कहना है कि आईसीई इन विज्ञापनों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर भर्ती अभियान के लिए कर रही है। इसके तहत मिनियापोलिस, शिकागो, पोर्टलैंड और न्यू ऑरलियन्स जैसे शहरों में हजारों नए अधिकारियों को तैनात करने की योजना है। आरोप है कि इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए भर्ती मानकों में भी ढील दी गई है।
पत्रों में दावा किया गया है कि आईसीई ने ऐसे विज्ञापन चलाए हैं, जिनमें ‘श्वेत राष्ट्रवादी प्रेरित प्रचार’ की झलक मिलती है। फेसबुक और इंस्टाग्राम पर ये विज्ञापन उन लोगों को दिखाए जा रहे हैं जो स्पेनिश भाषा, मैक्सिकन खाने या लैटिन संगीत में रुचि रखते हैं, ताकि उन पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जा सके।
सांसदों के अनुसार, पिछले 90 दिनों में डीएचएस ने ‘सेल्फ-डिपोर्टेशन,’ यानी खुद देश छोड़ने को बढ़ावा देने वाले विज्ञापनों पर 10 लाख डॉलर से ज्यादा खर्च किए हैं। इसके अलावा, गूगल और यूट्यूब पर स्पेनिश भाषा में ऐसे विज्ञापनों पर करीब 30 लाख डॉलर खर्च किए गए। बताया गया कि पिछले साल आईसीई ने मेटा और गूगल पर कुल मिलाकर लगभग 58 लाख डॉलर के विज्ञापन चलाए।
सांसदों ने एक इंस्टाग्राम विज्ञापन का उदाहरण भी दिया, जिसमें लिखा था, ‘हमारा घर फिर से हमारा होगा।’ सांसदों का कहना है कि यह नारा अक्सर कट्टरपंथी और नव-नाजी समूहों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है।
सांसदों ने यह भी आरोप लगाया कि आईसीई ने भर्ती के नियमों में ढील दी है, जैसे उम्र सीमा हटाना, 50,000 डॉलर तक का साइनिंग बोनस देना और नए भर्ती अधिकारियों को बिना पर्याप्त प्रशिक्षण के मैदान में उतारना शामिल हैं।
सांसदों ने मेटा और गूगल से यह भी पूछा कि उनके प्लेटफॉर्म पर ऐसे विज्ञापन कैसे चलने दिए गए, जबकि दोनों कंपनियों की नीतियां नफरत और भेदभावपूर्ण सामग्री के खिलाफ हैं। सांसदों ने मांग की कि कंपनियां यह स्पष्ट करें कि क्या इन विज्ञापनों का कंटेंट उनके आंतरिक मानकों के अनुरूप है और क्या उन्होंने डीएचएस से इस पर कोई बातचीत की थी।
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