Khabarwala24 UP News: उत्तर प्रदेश पुलिस महकमे में पदोन्नति के हक के लिए 46 वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ने वाले 85 वर्षीय सेवानिवृत्त उपनिरीक्षक राम अवतार सिंह यादव को आखिरकार इलाहाबाद उच्च न्यायालय से ऐतिहासिक न्याय मिला है। हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग को आदेश दिया है कि याची को 16 मार्च 1980 से निरीक्षक (इंस्पेक्टर) पद का प्रोन्नति लाभ दिया जाए।
‘प्रतिकूल प्रविष्टियां न बताना और रिकॉर्ड न होना विभाग की विधिक चूक’ (UP News)
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की पीठ ने इटावा के रहने वाले पूर्व दरोगा राम अवतार सिंह यादव की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह मील का पत्थर निर्णय सुनाया। उच्च न्यायालय ने पुलिस प्रशासन को फटकार लगाते हुए स्पष्ट किया कि विभाग यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा कि जिन प्रतिकूल प्रविष्टियों (Adverse Remarks) को आधार बनाकर याची की पदोन्नति रोकी गई थी, उनकी सूचना कभी संबंधित कर्मचारी को दी भी गई थी या नहीं।
पीठ ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि पुलिस महकमे ने याची को उसके न्यायसंगत अधिकार से वंचित रखकर उसके साथ गंभीर अन्याय और भेदभाव किया है।
1999 में रिटायरमेंट से लेकर ट्रिब्यूनल तक का मुश्किल सफर (UP News)
मामले के ऐतिहासिक पृष्ठभूमियों के अनुसार, राम अवतार सिंह यादव वर्ष 1999 में पुलिस विभाग में थानाध्यक्ष (स्टेशन ऑफिसर) के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। सेवाकाल के दौरान पदोन्नति न मिलने पर उन्होंने कई बार विभागीय अभ्यावेदन प्रस्तुत किए। हालांकि, तत्कालीन पुलिस महानिदेशक (DGP) ने 6 अप्रैल 2010 को उनके पदोन्नति के दावे को खारिज कर दिया था।
विभागीय स्तर पर न्याय न मिलने के बाद उन्होंने राज्य लोक सेवा अधिकरण (State Public Services Tribunal) का रुख किया। अधिकरण ने 30 नवंबर 2012 को उनकी मूल याचिका और 10 जून 2013 को समीक्षा याचिका (Review Petition) खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां भी अदम पैरवी (पैरवी के अभाव) के कारण 16 फरवरी 2015 को याचिका खारिज हो गई थी।
85 साल की उम्र में खुद की पैरवी और हाईकोर्ट का ऐतिहासिक रुख (UP News)
याचिका खारिज होने के बाद याची ने हार नहीं मानी और पुनर्स्थापना अर्जी (Restoration Application) दाखिल की। 11 दिसंबर 2025 को एक बार फिर पैरवी के अभाव में अर्जी खारिज होने के बावजूद 85 वर्षीय बुजुर्ग राम अवतार सिंह यादव ने असाधारण हिम्मत दिखाई। मई से जुलाई 2026 के दौरान वे स्वयं व्यक्तिगत रूप से हाईकोर्ट में उपस्थित होकर अपनी याचिका को बहाल कराने और पदोन्नति के हक की पैरवी करते रहे।
सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न न्यायिक दृष्टांतों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने पुरानी याचिका को बहाल किया और गुण-दोष के आधार पर मामले की अंतिम सुनवाई शुरू की। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि चयन प्रक्रिया में शामिल किए जाने और साक्षात्कार होने के बावजूद पुलिस विभाग अभ्यर्थियों के अंकपत्र या अंक तालिका से जुड़ा कोई भी मूल रिकॉर्ड कोर्ट के समक्ष पेश नहीं कर सका।
ट्रिब्यूनल के रवैये पर सख्त टिप्पणी और ‘नकारात्मक तथ्य’ का सिद्धांत (UP News)
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में राज्य लोक सेवा अधिकरण के निर्णय पर भी कड़ी विधिक आपत्ति दर्ज की। कोर्ट ने कहा कि विभागीय सेवा पुस्तिका में वर्ष 1973, 1975, 1978, 1979, 1981, 1987 और 1994 की जिन प्रतिकूल प्रविष्टियों का उल्लेख किया गया था, उनके तामील होने का कोई प्रमाण विभाग के पास नहीं था।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह यह साबित करे कि उसे कोई सूचना ‘कभी नहीं दी गई’। कानून में नकारात्मक तथ्य (Negative Fact) को साबित करना किसी भी पक्षकार के लिए असंभव होता है। अधिकरण ने याची पर यह साबित करने का अनुचित भार डालकर गंभीर विधिक भूल की थी कि उसे प्रविष्टियों की जानकारी नहीं मिली थी, जबकि यह साबित करने की जिम्मेदारी पूरी तरह पुलिस विभाग की थी।
चार सप्ताह के भीतर पूरा बकाया वेतन व पेंशन लाभ देने के निर्देश (UP News)
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस विभाग को सख्त निर्देश दिया है कि राम अवतार सिंह यादव को 16 मार्च 1980 की तिथि से इंस्पेक्टर पद पर पदोन्नत माना जाए। इसके साथ ही, उनकी सेवानिवृत्ति की तिथि (1999) तक का संशोधित वेतन, एरियर, अन्य अनुमन्य भत्ते तथा तदनुसार नए सिरे से पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों की गणना कर अगले 4 सप्ताह के भीतर पूरा भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
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