सामाजिक तानों को चीरकर आसमान छूने वालीं गंगूबाई हंगल, कैसे बनाई अलग पहचान

नई दिल्ली, 4 मार्च (khabarwala24)। भारतीय शास्त्रीय संगीत की ऐसी कई हस्तियां हैं, जिन्होंने तमाम संघर्षों के बावजूद परिस्थिति के सामने हार नहीं मानी और उनसे डटकर सामना किया। ऐसी ही एक शख्सियत का नाम गंगूबाई हंगल है, जिन्होंने उस दौर में घर की दहलीज पार की जब महिलाओं का घर से बाहर निकलना किसी […]

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नई दिल्ली, 4 मार्च (khabarwala24)। भारतीय शास्त्रीय संगीत की ऐसी कई हस्तियां हैं, जिन्होंने तमाम संघर्षों के बावजूद परिस्थिति के सामने हार नहीं मानी और उनसे डटकर सामना किया। ऐसी ही एक शख्सियत का नाम गंगूबाई हंगल है, जिन्होंने उस दौर में घर की दहलीज पार की जब महिलाओं का घर से बाहर निकलना किसी चुनौती से कम नहीं था।

गायिका गंगूबाई हंगल ने अपनी शानदार और गहरी आवाज से न सिर्फ रागों को जीवंत किया, बल्कि समाज की कठोर बाधाओं को तोड़कर एक मिसाल कायम की। इस हिम्मत का उन्हें खामियजा भी भुगतना पड़ा, जब लोग उन्हें ‘गानेवाली’ कहकर ताने मारते थे, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और संगीत जगत में अमिट छाप छोड़ी।

5 मार्च को उनकी जयंती है, साल 1913 में कर्नाटक के धारवाड़ (हंगल) में एक केवट परिवार में जन्मी गंगूबाई का बचपन गरीबी और सामाजिक भेदभाव से भरा था। उनकी मां अंबाबाई कर्नाटक संगीत की गायिका थीं, जिन्होंने उन्हें संगीत की पहली शिक्षा दी। मात्र 13 साल की उम्र में उन्होंने किराना घराने के उस्ताद सवाई गंधर्व से औपचारिक तालीम शुरू की।

उस समय समाज में महिलाओं का सार्वजनिक मंच पर गाना अस्वीकार्य था। खासकर निचली मानी जाने वाली जाति से आने वाली एक लड़की के लिए यह और भी कठिन था। लोग उन्हें ‘गानेवाली’ कहकर अपमानित करते थे, लेकिन गंगूबाई ने इन तानों को चुनौती में बदल दिया। उनकी आत्मकथा ‘ए लाइफ इन थ्री ऑक्टेव्स: द म्यूजिकल जर्नी ऑफ गंगूबाई हंगल’ में इन संघर्षों का विस्तार से जिक्र है।

उनकी गायकी की विशेषता थी गहरी, स्थिर और भाव से भरी प्रस्तुति। वह राग को धीरे-धीरे विस्तार देती थीं, उनकी आवाज इतनी प्रभावशाली थी कि श्रोता दिल से जुड़ जाते थे। 1930 के दशक में मुंबई के स्थानीय कार्यक्रमों और गणेश उत्सवों से शुरुआत कर उनका सफर ऑल इंडिया रेडियो और देशभर के मंचों तक पहुंचा। शुरू में भजन और ठुमरी गाती थीं, लेकिन बाद में पूरी तरह रागों पर केंद्रित हो गईं और किराना घराने की परंपरा को नई ऊंचाइयों पर ले गईं।

गंगूबाई के योगदान को कई बड़े सम्मानों से सराहा गया। 1962 में कर्नाटक संगीत नृत्य अकादमी पुरस्कार, 1971 में पद्म भूषण, 2002 में पद्म विभूषण, 1973 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 1996 में फेलोशिप मिली। 1997 में दीनानाथ प्रतिष्ठान और 1998 में माणिक रतन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

उनकी स्मृति में कर्नाटक सरकार ने 2008 में कर्नाटक स्टेट डॉ. गंगूबाई हंगल म्यूजिक एंड परफॉर्मिंग आर्ट्स यूनिवर्सिटी स्थापित की। 2014 में भारत सरकार ने उनकी याद में डाक टिकट जारी किया।

गंगूबाई का नीजि जीवन भी कई दुखों से भरा था, 16 साल की उम्र में शादी, 20 साल की उम्र में पति का देहांत, बेटी कृष्णा की कैंसर से मौत इन सबसे से भी वह उबरीं और संगीत से कभी अलग नहीं हुईं। साल 2006 में 75 साल के करियर का जश्न मनाते हुए उन्होंने आखिरी प्रस्तुति दी थी। 21 जुलाई 2009 को 97 साल की उम्र में हृदय रोग से उनका निधन हो गया।

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