नई दिल्ली, 20 जनवरी (khabarwala24)। भारत में 21 जनवरी केवल कैलेंडर का एक साधारण दिन नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय इतिहास में दर्ज एक महत्वपूर्ण पड़ाव का प्रतीक है। इसी दिन मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा ने अलग-अलग राज्यों के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान प्राप्त की और भारतीय संघ में औपचारिक रूप से स्थान पाया। इसी दिन इन तीनों राज्यों की स्थापना हुई।
पूर्वोत्तर क्षेत्र को अक्सर उसकी भौगोलिक स्थिति के कारण मुख्यधारा से अलग समझ लिया जाता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह इलाका विविध संस्कृतियों, परंपराओं, ऐतिहासिक अनुभवों और लंबे राजनीतिक संघर्षों से समृद्ध रहा है। 21 जनवरी उसी संघर्ष, संवाद और संवैधानिक समाधान की प्रक्रिया का स्मरण कराता है, जिसने इन राज्यों को अपनी पहचान और स्वायत्तता दिलाई।
तीनों राज्यों की यात्रा अलग-अलग रही, लेकिन मंजिल एक थी और यह मंजिल स्वायत्तता, पहचान और लोकतांत्रिक अधिकार थी। कहीं, राजशाही से लोकतंत्र तक का संक्रमण था, तो कहीं सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का आंदोलन। 21 जनवरी, 1972 ने इन सभी यात्राओं को एक साझा मुकाम पर ला खड़ा किया।
1947 से पहले मणिपुर एक स्वतंत्र रियासत था। महाराजा बोधचंद्र सिंह ने भारत सरकार के साथ परिग्रहण के साधन पर हस्ताक्षर किए, जिसमें आंतरिक स्वायत्तता के साथ भारत में विलय की सहमति दी गई। मणिपुर की खासियत यह रही कि यहां वर्ष 1948 में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव हुए और यह एक संवैधानिक राजतंत्र बना, जो उस दौर में अपने आप में एक अनूठा उदाहरण था। लेकिन, 1949 में परिस्थितियां बदलीं। भारत सरकार के दबाव में महाराजा ने निर्वाचित विधानसभा से परामर्श किए बिना विलय समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके बाद मणिपुर की विधानसभा भंग कर दी गई और यह भाग ‘सी’ राज्य बना। इसके बाद, 1 नवंबर 1956 को मणिपुर केंद्र शासित प्रदेश बना और अंततः 21 जनवरी 1972 को पूर्वोत्तर क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम, 1971 के तहत इसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। यह दिन मणिपुर के लिए खोई हुई राजनीतिक आवाज की वापसी का प्रतीक बना।
इसी तरह, त्रिपुरा भी एक रियासत थी, जिसका 1949 में भारत में विलय हुआ। राजा बीर बिक्रम की मृत्यु के बाद शासन संभाल रहीं रानी कंचन प्रभा देवी ने भारत में विलय की अनुमति दी। विलय के बाद त्रिपुरा भाग ‘सी’ राज्य बना और वर्ष 1956 में इसे केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया। लंबे समय तक प्रशासनिक सीमाओं में रहने के बाद त्रिपुरा को भी पूर्ण राज्यत्व की प्रतीक्षा थी। यह प्रतीक्षा 21 जनवरी 1972 को समाप्त हुई, जब एनईए-(आर) अधिनियम, 1971 के तहत त्रिपुरा भारत का पूर्ण राज्य बना। यह दिन त्रिपुरा के लिए केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक सहभागिता के विस्तार का संकेत था।
दो राज्यों की कहानी लगभग एक सी है। लेकिन, मेघालय की कहानी बाकी दोनों से अलग है। यहां राज्य बनने की मांग असम के भीतर खासी, जैंतिया और गारो हिल्स के लोगों द्वारा अपनी स्वदेशी संस्कृति और पहचान को संरक्षित करने के लिए उठी। यह आंदोलन सिर्फ प्रशासनिक नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक आत्मसम्मान से जुड़ा था।
वर्ष 1969 में असम पुनर्गठन (मेघालय) अधिनियम के तहत मेघालय को असम के भीतर एक स्वायत्त राज्य बनाया गया। यह राज्यत्व की दिशा में पहला ठोस कदम था। इसके बाद 21 जनवरी 1972 को एनईए-(आर) अधिनियम, 1971 के तहत मेघालय को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला और यह भारत का 21वां राज्य बना। राजधानी शिलांग बनी, जो आज भी पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक और शैक्षणिक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र है।
मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय का स्थापना दिवस सिर्फ तीन राज्यों का जन्मदिन नहीं है, बल्कि यह भारत की संघीय संरचना की जीवंतता का प्रमाण है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि भारत केवल एक भू-राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि इतिहास, पहचान और संवाद से बना एक सतत विकसित होता संघ है।
Breaking News in Hindi और Latest News in Hindi सबसे पहले मिलेगी आपको सिर्फ Khabarwala24 पर. Hindi News और India News in Hindi से जुड़े अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें Facebook पर ज्वॉइन करें, Twitter पर फॉलो करें और Youtube Channel सब्सक्राइब करे।


