बिलासपुर, 2 जनवरी (khabarwala24)। छत्तीसगढ़ शराब घोटाले के मामले में चैतन्य बघेल को राहत मिली है। बिलासपुर हाईकोर्ट ने चैतन्य बघेल को जमानत दी है। चैतन्य बघेल ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की गिरफ्तारी के खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर की थी। कोर्ट ने उनकी याचिका का संज्ञान लेते हुए चैतन्य बघेल को जमानत दे दी है।
इससे पहले कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका पर सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। शुक्रवार को यह फैसला जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की सिंगल बेंच ने सुनाया है।
नए साल की शुरुआत में चैतन्य बघेल को राहत मिलने से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में खुशी का माहौल है।
चैतन्य बघेल को ईडी ने शराब घोटाला मामले में गिरफ्तार किया था। हाल ही में ईडी ने शराब घोटाले में फाइनल चार्जशीट दाखिल की थी। चैतन्य बघेल को जमानत मिलने के बाद माना जा रहा है कि वह जेल से रिहा हो सकते हैं।
वहीं, छत्तीसगढ़ के पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने कहा कि ये खुशी की बात है कि हाई कोर्ट ने चैतन्य बघेल को ईडी और ईओडब्ल्यू दोनों मामलों में जमानत दी है। पप्पू बंसल नाम के फरार व्यक्ति के बयान के आधार पर चैतन्य की गिरफ्तारी हुई थी। उन्होंने कहा कि आज सत्य की जीत हुई है। सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं हो सकता है।
उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर उनको परेशान कर रही है, लेकिन कांग्रेस पार्टी के नेताओं के संबल और कार्यकर्ताओं के सहयोग से यह सफलता मिली है।
बता दें कि ईडी ने विशेष अदालत में अंतिम अभियोजन शिकायत दाखिल की थी, जिसमें 59 नए लोगों को आरोपी बनाया गया। इससे कुल आरोपियों की संख्या 81 हो गई। जांच के अनुसार, यह घोटाला 2019 से 2022 के बीच हुआ, जब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी। ईडी का अनुमान है कि इस अवैध धंधे से करीब तीन हजार करोड़ रुपए की गैरकानूनी कमाई हुई, जिससे राज्य के खजाने को भारी नुकसान पहुंचा।
इस घोटाले की जांच में एक संगठित सिंडिकेट का पता चला, जिसमें नौकरशाह, राजनीतिक नेता और निजी कारोबारी शामिल थे। सिंडिकेट ने शराब की नीति को कमजोर करके अवैध तरीकों से पैसा कमाया।
उन्होंने चार मुख्य रास्तों का इस्तेमाल किया। पहला, शराब सप्लायर्स से अवैध कमीशन वसूला गया। इसके लिए शराब की आधिकारिक कीमत को कृत्रिम रूप से बढ़ाया जाता था, जिससे राज्य का पैसा ही रिश्वत के रूप में इस्तेमाल होता था। दूसरा, बिना हिसाब की शराब बेची जाती थी। नकली होलोग्राम वाली बोतलें नकद में खरीदकर सरकारी दुकानों से बेची जातीं, जिससे कोई टैक्स या उत्पाद शुल्क नहीं जाता था। तीसरा, डिस्टिलरी वाले बाजार में हिस्सा बनाए रखने और लाइसेंस के लिए सालाना रिश्वत देते थे। चौथा, विदेशी शराब के लिए नई लाइसेंस श्रेणी बनाई गई, जिसमें सिंडिकेट को बड़ा मुनाफा मिलता था।
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