Khabarwala24 News: सिविल जज (जूनियर डिवीजन) बनने का सपना देख रहे लाखों लॉ ग्रेजुएट्स के लिए सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया में ऐतिहासिक बदलाव किया है। शीर्ष अदालत ने न्यायिक सेवा में सीधे चयन के लिए तय तीन साल के अनिवार्य वकालत के नियम को घटाकर अब महज एक साल कर दिया है।
31 मार्च 2027 तक मिलेगी बड़ी राहत
सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले युवाओं को फौरन राहत देने के लिए एक अंतरिम व्यवस्था (ट्रांजिशन पीरियड) तय की है। इसके तहत 31 मार्च 2027 तक सिविल जज की भर्तियों के लिए निकलने वाले विज्ञापनों में बिना किसी अनुभव के भी उम्मीदवार परीक्षा दे सकेंगे।
यानी मौजूदा समय से लेकर मार्च 2027 के अंत तक नए कानून स्नातकों के पास बिना वकालत का अनुभव दिखाए भी न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल होने का पूरा अवसर रहेगा। यह फैसला उन युवाओं के लिए संजीवनी की तरह है जो पढ़ाई खत्म करते ही जज बनने की तैयारी में जुट जाते हैं।
1 अप्रैल 2027 से लागू होगा नया नियम
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह छूट हमेशा के लिए नहीं है। 1 अप्रैल 2027 को या उसके बाद जारी होने वाली सभी न्यायिक सेवा भर्ती अधिसूचनाओं में नया नियम पूरी तरह लागू हो जाएगा।
इस नई व्यवस्था के तहत आवेदन करने वाले उम्मीदवारों के पास बार में कम से कम एक साल की सत्यापित और सक्रिय (वेरिफाइड एक्टिव) प्रैक्टिस का अनुभव होना अनिवार्य होगा। कोर्ट का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि बेंच पर बैठने से पहले युवाओं के पास कोर्ट-कचहरी के कामकाज की व्यावहारिक समझ हो।
चयन के बाद 1.5 साल का कठोर प्रशिक्षण
सुप्रीम कोर्ट ने केवल अनुभव की शर्त में ढील नहीं दी है, बल्कि जज बनने के बाद की ट्रेनिंग प्रक्रिया को भी और अधिक मजबूत बनाया है। नए नियमों के अनुसार, परीक्षा में सफल होने वाले अभ्यर्थियों को सीधी नियुक्ति देने के बजाय दो चरणों के प्रशिक्षण से गुजरना होगा:
- 1 साल की एकेडमी ट्रेनिंग: चयनित अधिकारियों को सबसे पहले संबंधित राज्य की ज्यूडिशियल एकेडमी में एक साल का गहन सैद्धांतिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा।
- 6 महीने की लॉ क्लर्कशिप: एकेडमी की पढ़ाई पूरी करने के बाद अभ्यर्थियों को छह महीने तक जिला एवं सत्र न्यायाधीश या उच्चतर न्यायिक सेवा (HJS) के किसी वरिष्ठ अधिकारी के अधीन क्लर्कशिप करनी होगी।
इस डेढ़ साल के संयुक्त प्रशिक्षण का उद्देश्य नए जजों को वास्तविक सुनवाई, अदालती रिकॉर्ड के प्रबंधन, साक्ष्य मूल्यांकन और कानूनी प्रक्रियाओं की बारीकियों से व्यावहारिक रूप से रूबरू कराना है।
मई 2025 के फैसले की समीक्षा के बाद आया निर्णय
यह पूरा कानूनी मोड़ सुप्रीम कोर्ट द्वारा 20 मई 2025 को सुनाए गए एक फैसले के बाद आया है। उस फैसले में कोर्ट ने निचली अदालतों में जजों की गुणवत्ता सुधारने का हवाला देते हुए तीन साल की लीगल प्रैक्टिस को अनिवार्य कर दिया था।
इससे पहले 2002 के एक फैसले के आधार पर नए लॉ ग्रेजुएट्स को सीधे परीक्षा देने की अनुमति थी। हालांकि, मई 2025 के कड़े फैसले के बाद देशभर के कानून छात्रों में निराशा फैल गई थी, जिसके खिलाफ शीर्ष अदालत में कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गई थीं। अब कोर्ट ने अपनी पिछली व्यवस्था की समीक्षा करते हुए बीच का संतुलित रास्ता निकाला है।
समीक्षा याचिकाओं में अभ्यर्थियों ने रखी थीं ये मजबूत दलीलें
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में वकालत की तीन साल की बाध्यता के खिलाफ कई व्यावहारिक और आर्थिक तर्क दिए गए थे:
- आर्थिक तंगी: नए वकीलों को शुरुआत में कोर्ट में कोई निश्चित आय नहीं मिलती। ऐसे में गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के युवाओं के लिए तीन साल तक बिना सही कमाई के वकालत में टिके रहना बेहद मुश्किल हो जाता है।
- गैर-लिटिगेशन क्षेत्र के युवाओं के साथ भेदभाव: लॉ फर्मों, कॉरपोरेट हाउस या सरकारी उपक्रमों (PSUs) में काम करने वाले लीगल प्रोफेशनल्स कोर्ट में मुकदमों की पैरवी नहीं करते। तीन साल की बार प्रैक्टिस की शर्त के कारण वे परीक्षा से पूरी तरह बाहर हो रहे थे।
- इंटर्नशिप का अनुभव: याचिकाओं में कहा गया कि 5 साल या 3 साल के लॉ कोर्स के दौरान छात्र पहले से ही विभिन्न अदालतों में इंटर्नशिप करके अदालती माहौल को समझ चुके होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने बनाया व्यावहारिक और शैक्षणिक संतुलन
शीर्ष अदालत ने अपने नए आदेश के जरिए एक तरफ जहां महत्वाकांक्षी युवाओं को लंबी अनिवार्य वकालत के बोझ से राहत दी है, वहीं दूसरी तरफ 1 साल की बार प्रैक्टिस और 1.5 साल की पोस्ट-सिलेक्शन ट्रेनिंग जोड़कर न्यायपालिका की गुणवत्ता से भी कोई समझौता नहीं किया है।
अब लॉ ग्रेजुएट्स 2027 तक सीधे परीक्षा में बैठ सकते हैं और उसके बाद भी उन्हें महज 1 साल की वकालत का प्रमाण पत्र देना होगा, जिससे न्यायिक सेवा में प्रतिभावान युवाओं का आना आसान हो जाएगा।
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