Khabarwala 24 News Sonipat: Haryana News समाज किस दिशा में जा रहा है और आधुनिकता की दौड़ में मानवीय संवेदनाएं किस कदर दम तोड़ रही हैं, इसका एक रोंगटे खड़े कर देने वाला मामला हरियाणा के सोनीपत से सामने आया है। एक वक्त पर महाराष्ट्र के बड़े कपड़ा व्यापारी रहे शिवचरण रतन गुप्ता ने अपनी बेटियों से मिलने की आस में वृद्धाश्रम में अंतिम सांस ली। लेकिन अफसोस, जिन्हें पढ़ा-लिखाकर उन्होंने काबिल बनाया, उन तीन बेटियों के पास अपने बेजान पिता के अंतिम दर्शन करने तक की फुर्सत नहीं थी। बेटियों ने अपने पिता का अंतिम संस्कार भी फोन पर वीडियो कॉल के जरिए देखा और 5,100 रुपये ऑनलाइन भेजकर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लिया।
वृद्धाश्रम में ली अंतिम सांस, बीमार पिता से मिलने भी नहीं आईं बेटियां (Haryana News)
जानकारी के मुताबिक, मूल रूप से महाराष्ट्र के बड़े कपड़ा व्यापारी शिवचरण रतन गुप्ता अपनी पत्नी मीना गुप्ता के साथ करीब डेढ़ साल पहले सोनीपत के एक वृद्धाश्रम में रहने आए थे। उनका कोई बेटा नहीं था। उन्होंने अपनी तीन बेटियों—अनीता, निशा और प्रिया को बड़े लाड-प्यार से पाला-पोसा और पढ़ा-लिखाकर इस काबिल बनाया कि उनमें से दो बेटियां आज शिक्षिका (टीचर) के रूप में कार्यरत हैं।
शिवचरण की पत्नी का निधन पहले ही हो चुका था। वृद्धाश्रम संचालक आनंद कुमार ने बताया कि लगभग 20 दिन पहले जब शिवचरण गुप्ता की तबीयत बिगड़ने लगी, तो उन्होंने तीनों बेटियों को इसकी सूचना दी। लेकिन हर बार बेटियों ने कोई न कोई बहाना बनाकर आने से इनकार कर दिया। बीमार होने के बाद बेटियों ने फोन करना भी बंद कर दिया था।
‘समय नहीं है’: मृत्यु के बाद भी बेटियों ने आने से किया इनकार (Haryana News)
जब देर रात शिवचरण गुप्ता की मृत्यु हुई, तो वृद्धाश्रम प्रबंधन ने तुरंत बेटियों को फोन कर कहा कि यदि वे आ रही हैं, तो पार्थिव शरीर को सुरक्षित रखवा दिया जाता है। लेकिन बेटियों ने साफ कह दिया कि उनके पास आने का समय नहीं है।
वृद्धाश्रम संचालक के अनुसार, मोबाइल स्क्रीन पर जब मृतक पिता का चेहरा वीडियो कॉल के जरिए दिखाया गया, तो बेटी के मुंह से बस ‘पापा’ निकला। जब उनसे कहा गया कि 20 तारीख से पहले आकर पिता की अस्थियां ले जाएं, तो मुंबई में रहने वाली सबसे छोटी बेटी ने बेरुखी से कहा, “20 तारीख से पहले देखते हैं।”
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ऑनलाइन भेजे 5,100 रुपये और कहा- ‘वीडियो भेज देना’ (Haryana News)
संवेदनहीनता की हद तो तब पार हो गई जब वृद्धाश्रम के सदस्य पिता की चिता को अग्नि दे रहे थे और फोन पर बेटी पूछ रही थी कि “अभी और कितना टाइम लगेगा?” जब उसे बताया गया कि चिता को अग्नि दे दी गई है और 10-15 मिनट में प्रक्रिया पूरी हो जाएगी, तो उसने कहा— “सारा काम अच्छे से हो गया ना, मुझे सारी वीडियो भेज देना।”
बड़ी बेटी अनीता, जो नेपाल में टीचर है, उसने ऑनलाइन ₹5,100 ट्रांसफर किए और कहा कि पिता का अंतिम संस्कार ठीक से कर दिया जाए। शुरुआत में बेटियों ने अस्थियां संभालकर रखने को कहा था, लेकिन बाद में मना करते हुए कहा कि उनके पास समय नहीं है, इसलिए आश्रम वाले ही अस्थियों को गंगा में प्रवाहित कर दें।
कहा-कहां रहती हैं बेटियां? (Haryana News)
शिवचरण गुप्ता की तीनों बेटियां अपने-अपने जीवन में पूरी तरह सेटल और कामयाब हैं। अनीता (बड़ी बेटी): नेपाल में शिक्षिका (टीचर) है। निशा (मझली बेटी): उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में रहती है। प्रिया (सबसे छोटी बेटी): मुंबई में रहती है।
पैसा और कामयाबी मिली, लेकिन संस्कार छूट गए (Haryana News)
इस दुखद घटना ने पूरे समाज और इलाके के लोगों को झकझोर कर रख दिया है। स्थानीय लोगों और वृद्धाश्रम के सदस्यों का कहना है कि शिवचरण जी ने अपने जीवन में बहुत पैसा कमाया और बेटियों को हर सुख-सुविधा दी, लेकिन शायद वे बच्चों को नैतिक संस्कार देना भूल गए।
यह घटना हर माता-पिता और आज की पीढ़ी के लिए एक बड़ा सबक है कि बच्चों को केवल डिग्रियां और करियर में कामयाबी देना ही काफी नहीं है; उनमें नैतिक मूल्य, संवेदनशीलता और अपनेपन का अहसास जगाना सबसे ज्यादा जरूरी है।
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