नवरात्रि विशेष: आदिशक्ति का दिव्य धाम, जहां माता सती का गिरा था शीश, ‘अन्न की देवी’ के रूप में विराजती हैं माता

सहारनपुर, 17 मार्च (khabarwala24)। नौ दिनों तक चलने वाली देवी आराधना का पर्व नवरात्रि 19 मार्च से शुरू हो रहा है। इस दौरान देशभर में श्रद्धालु मां के विभिन्न रूपों की पूजा करते हैं। देश-दुनिया में माता के तमाम मंदिर हैं, जो भक्ति-शक्ति के साथ अद्भुत कथा को कहते हैं। एक ऐसा ही दिव्य धाम […]

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सहारनपुर, 17 मार्च (khabarwala24)। नौ दिनों तक चलने वाली देवी आराधना का पर्व नवरात्रि 19 मार्च से शुरू हो रहा है। इस दौरान देशभर में श्रद्धालु मां के विभिन्न रूपों की पूजा करते हैं। देश-दुनिया में माता के तमाम मंदिर हैं, जो भक्ति-शक्ति के साथ अद्भुत कथा को कहते हैं। एक ऐसा ही दिव्य धाम उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थित है, जो 51 शक्तिपीठों में से एक है।

सहारनपुर में मां शाकुम्भरी देवी मंदिर स्थित है। यहां मां सती का शीश गिरा था, और वह अन्न की देवी के रूप में विराजमान हैं और भक्तों का कल्याण करती हैं। यह मंदिर शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में बेहट तहसील के जसमौर गांव के निकट स्थित है। मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा हुआ है। भक्तों का विश्वास है कि मां शाकुम्भरी स्वयं उनकी रक्षा करती हैं और पूर्ण श्रद्धा से दर्शन करने वाले की मनोकामनाएं पूरी करती हैं।

उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के अनुसार, आस्था का वह धाम, जहां मां स्वयं भक्तों की रक्षा करती हैं। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में स्थित मां शाकुम्भरी देवी मंदिर शक्ति, भक्ति और मां की करुणा का अलौकिक धाम है।

मान्यताओं के अनुसार, मां ने कठिन काल में सृष्टि का पालन कर जगत को जीवन दिया था, इसलिए यहां आने वाला हर भक्त पूर्ण विश्वास और गहरी श्रद्धा के साथ मां के चरणों में नमन करता है। प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा से घिरा यह धाम मन को शांति, आस्था और नई शक्ति से भर देता है।

धार्मिक कथा के अनुसार, जब दानव शुंभ-निशुंभ, महिषासुर और रक्तबीज ने देवताओं पर आक्रमण किया, तो देवता छिपते-छिपते शिवालिक पहाड़ियों पर पहुंच गए। नारद मुनि के सुझाव पर देवताओं ने मां से सहायता मांगी। इसी दौरान भूरादेव अपने पांच साथियों के साथ मां की शरण में आए और युद्ध में शामिल होने की आज्ञा मांगी। मां ने वरदान दिया और युद्ध शुरू हुआ। रक्तबीज नामक राक्षस का खास गुण था कि उसकी खून की एक बूंद जमीन पर गिरने से नया राक्षस पैदा हो जाता था। मां ने विकराल रूप धारण किया और चक्र से राक्षसों का संहार किया।

मां काली ने खप्पर से रक्तबीज का सिर काटकर उसका रक्त पी लिया, जिससे नए राक्षस नहीं बन सके। युद्ध के अंत में शुंभ-निशुंभ ने भूरादेव पर बाण चलाए और वे गिर पड़े। युद्ध समाप्त होने पर मां ने भूरादेव को जीवित किया और वरदान मांगने को कहा। भूरादेव ने मां के चरणों की सेवा मांगी। मां ने वरदान दिया कि जो भी मेरे दर्शन करेगा, उसे पहले भूरादेव के दर्शन करने होंगे, तभी यात्रा पूरी होगी, इसलिए मंदिर में सबसे पहले भूरादेव के दर्शन होते हैं।

भूरादेव का मंदिर मुख्य मंदिर से करीब एक किलोमीटर दूर है। मंदिर के पास बरसाती नदी का रास्ता है, जो सूखा रहता है और केवल बरसात में पानी से भरता है। नवरात्रि के दौरान यहां विशाल मेला लगता है। श्रद्धालु दर्शन के लिए बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं।

धार्मिक मान्यता है कि शाकुम्भरी देवी का नाम दुर्गमासुर वध से जुड़ा है। जब दुर्गमासुर ने वेदों पर कब्जा कर अकाल फैलाया, तो देवी ने अपने नेत्रों से जल बहाया। उस जल से धाराएं निकलीं और वनस्पतियां हरी-भरी हो गईं। सौ नेत्रों से दया की दृष्टि डालने के कारण उन्हें शताक्षी कहा गया। अकाल में उन्होंने अपने शरीर से शाक-सब्जियां उत्पन्न कर पृथ्वी का पालन किया, इसलिए नाम शाकुम्भरी पड़ा। मंदिर में मुख्य प्रतिमा के दाईं ओर भीमा और भ्रामरी तथा बाईं ओर शताक्षी या शीतला देवी विराजमान हैं।

मान्यता है कि शाकुम्भरी देवी की उपासना करने वाले घरों में हमेशा अन्न और शाक से भंडार भरा रहता है। यह धाम अन्नपूर्णा के रूप में भी पूजा जाता है।

यहां पहुंचने के लिए सहारनपुर रेलवे स्टेशन या बेहट बस स्टैंड से बस या निजी वाहन से जा सकते हैं। हवाई यात्रा के लिए नजदीकी हवाई अड्डा देहरादून या दिल्ली है।

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