तेहरान में खामेनेई की याद में तीन दिन की शोक सभा का आयोजन

तेहरान, 4 मार्च (khabarwala24)। ईरान की राजधानी तेहरान में बुधवार रात 12 बजे (भारतीय समयानुसार) से ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई की याद में तीन दिनों का कार्यक्रम शुरू होगा।ईरान की तसनीम न्यूज एजेंसी के मुताबिक, लोग तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला में इकट्ठा होकर उन्हें श्रद्धांजलि देंगे। खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक की तारीख और […]

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तेहरान, 4 मार्च (khabarwala24)। ईरान की राजधानी तेहरान में बुधवार रात 12 बजे (भारतीय समयानुसार) से ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई की याद में तीन दिनों का कार्यक्रम शुरू होगा।

ईरान की तसनीम न्यूज एजेंसी के मुताबिक, लोग तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला में इकट्ठा होकर उन्हें श्रद्धांजलि देंगे। खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक की तारीख और बाकी जानकारी का खुलासा नहीं किया गया है।

सरकारी मीडिया ने इस समारोह की अहमियत पर जोर दिया है, और इसे देश के इतिहास में एक अहम पल बताया है। उम्मीद जताई गई है कि अलग-अलग इलाकों से आए लोग इसमें शामिल होकर श्रद्धांजलि देंगे।

बुधवार को खामेनेई के बेटे को देश का सर्वोच्च नेता चुन लिए जाने की घोषणा की गई। ईरान की विशेषज्ञ सभा ने उन्हें इस पद के लिए नियुक्त किया। शनिवार को तेहरान पर अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हवाई हमलों के दिन ही सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई समेत ईरान के कई शीर्ष कमांडर्स की मौत हो गई थी।

ईरान इंटरनेशनल की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, यह चयन शक्तिशाली इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) के दबाव में किया गया। सूत्रों ने बताया कि वर्तमान युद्ध स्थिति के कारण विशेषज्ञ सभा की पूर्ण बैठक संभव नहीं हो पाई, इसलिए फैसला आभासी बैठकों और आंतरिक परामर्श के जरिए लिया गया।

रिपोर्ट कहती है कि उनका इस पद के लिए चुना जाना राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जा रहा है। इसकी वजह यह है कि कुछ ही दिन पहले अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों में उनके पिता अली खामेनेई की मौत हो गई थी। इन हमलों के बाद पूरे मध्य पूर्व में तनाव और टकराव बढ़ गया है।

ईरान का इस्लामी गणराज्य हमेशा से खुद को वंशानुगत राजतंत्र के खिलाफ एक वैचारिक विकल्प के रूप में पेश करता रहा है। यानी ईरान की व्यवस्था में सत्ता परिवार के आधार पर आगे बढ़ाने का समर्थन नहीं किया जाता। ऐसे में अगर पिता के बाद बेटा सत्ता संभालता है, तो इससे व्यवस्था के सिद्धांतों पर सवाल उठ सकते हैं।

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि आईआरजीसी ने असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के धार्मिक नेताओं पर मोजतबा के समर्थन के लिए काफी दबाव डाला।

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