आतंकी भूमिकाएं और प्रचार के जरिये आईएसकेपी भारतीय युवाओं को कर रहा आकर्षित

नई दिल्ली, 6 फरवरी (khabarwala24)। इस्लामिक स्टेट (आईएस) से जुड़े भारतीय मूल के आतंकियों को अब पहले की तुलना में अधिक लड़ाकू भूमिकाएं दी जा रही हैं। इसी रणनीति के तहत उन्हें अफगानिस्तान भेजा जा रहा है, जहां इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (आईएसकेपी) उन्हें युद्ध में शामिल करने और प्रचार के जरिए “नायक” के रूप […]

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नई दिल्ली, 6 फरवरी (khabarwala24)। इस्लामिक स्टेट (आईएस) से जुड़े भारतीय मूल के आतंकियों को अब पहले की तुलना में अधिक लड़ाकू भूमिकाएं दी जा रही हैं। इसी रणनीति के तहत उन्हें अफगानिस्तान भेजा जा रहा है, जहां इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (आईएसकेपी) उन्हें युद्ध में शामिल करने और प्रचार के जरिए “नायक” के रूप में पेश कर रहा है।

साल 2019 में इस्लामिक स्टेट से जुड़े भारतीयों की संख्या करीब 200 बताई गई थी। उस समय लौटकर आए कुछ लोगों ने पूछताछ में कहा था कि उन्हें केवल छोटे-मोटे काम दिए गए और उनके साथ भेदभाव किया गया। इससे कई भारतीय भर्तियों में नाराजगी थी और वे वापस लौटना चाहते थे।

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हालांकि अब हालात बदल गए हैं। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, इस्लामिक स्टेट भारतीय मूल के अपने ऑपरेटिव्स को अब अफगानिस्तान भेज रहा है, जहां आईएसकेपी का प्रभाव है। संगठन भारतीय युवाओं को कट्टरपंथी बनाकर उन्हें भारत से बाहर निकालने और अफगानिस्तान में तैनात करने की कोशिश कर रहा है।

अधिकारियों का कहना है कि भारतीय ऑपरेटिव्स सीरिया और इराक के बजाय अफगानिस्तान को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसके पीछे एक वजह सांस्कृतिक समानता बताई जा रही है, जबकि अरब देशों की तुलना में अफगानिस्तान में काम करना उन्हें आसान लगता है।

खुफिया एजेंसियां भारत से अफगानिस्तान की ओर किसी भी संभावित आतंकी मूवमेंट पर कड़ी नजर रखे हुए हैं। आईएसकेपी को हाल के वर्षों में भारी नुकसान उठाना पड़ा है, ऐसे में वह नए लड़ाकों की तलाश में है।

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इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक अधिकारी के अनुसार, यात्रा का रास्ता सीधा नहीं होता। कई भर्तियां पहले खाड़ी देशों का रुख कर सकती हैं और फिर वहां से अफगानिस्तान पहुंचती हैं, ताकि सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बचा जा सके।

पहले भारतीय भर्तियों के पास केवल सीरिया और इराक का विकल्प था, लेकिन वहां से लौटे लोगों की डरावनी कहानियों के बाद भारत से भर्ती लगभग ठप हो गई थी। वहां भारतीयों को युद्ध में उतरने की अनुमति नहीं दी जाती थी और उन्हें केवल मामूली काम सौंपे जाते थे।

अफगानिस्तान में स्थिति बिल्कुल अलग है। यहां भारतीय ऑपरेटिव्स को न केवल लड़ाकू भूमिकाएं दी जा रही हैं, बल्कि आत्मघाती हमलावरों के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा रहा है। यही कारण है कि अफगानिस्तान भारतीय भर्तियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है।

हाल के उदाहरणों में अबू खालिद अल-हिंदी, अबू राजह अल-हिंदी और नजीब अल-हिंदी को आत्मघाती हमलों के लिए चुना गया।

आईएसकेपी केवल यहीं तक सीमित नहीं है। संगठन अपने मजबूत प्रचार तंत्र के जरिए इन लोगों को “शहीद” और “नायक” के रूप में पेश करता है। आईएसकेपी की पत्रिका ‘वॉयस ऑफ खुरासान’ में नजीब अल-हिंदी की कहानी चार पन्नों में प्रकाशित की गई थी। केरल के रहने वाले अबू खालिद अल-हिंदी को भी इसी पत्रिका में प्रमुखता से दिखाया गया।

इन लेखों में उनके “बलिदान”, कठिन यात्राओं और संघर्षों का महिमामंडन किया जाता है, जिसका इस्तेमाल युवाओं को बहकाने और भर्ती के लिए किया जा रहा है।

खुफिया अधिकारियों का कहना है कि हाल के महीनों में ऑनलाइन गतिविधियां कई गुना बढ़ी हैं। आईएसकेपी भारतीय ऑपरेटिव्स को जो महत्व दे रहा है, वही युवाओं को आकर्षित कर रहा है।

एजेंसियों के मुताबिक, आईएसकेपी का दीर्घकालिक लक्ष्य भारत से हजारों युवाओं की भर्ती कर उन्हें अफगानिस्तान भेजना है। क्षेत्र में हालात कठिन होते जा रहे हैं और संगठन को लड़ाई के लिए नए लोगों की जरूरत है। ऐसे में वह भारतीय भर्तियों को सबसे उपयुक्त मानता है।

अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यह प्रक्रिया आगे भी जारी रह सकती है और सुरक्षा एजेंसियों को हाई अलर्ट पर रहने की जरूरत है।

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