वाशिंगटन, 25 जनवरी (khabarwala24)। भारत और अमेरिका के अधिकारी प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिश में लगे हैं। समझौते के अधिकतर मुद्दों पर दोनों देशों की सहमति बन चुकी है, लेकिन कुछ संवेदनशील मामलों पर अब भी मतभेद बने हुए हैं। इनमें आयात-निर्यात पर लगने वाले शुल्क और समझौते को लागू करने के क्रम से जुड़े सवाल शामिल हैं। दोनों देश ऐसा समझौता चाहते हैं, जिससे आपसी व्यापार में स्थिरता और भरोसा बना रहे।
पिछले कुछ हफ्तों में बातचीत काफी आगे बढ़ी है और अब केवल कुछ ही मुद्दे बचे हैं। बातचीत से जुड़े लोगों के अनुसार तकनीकी स्तर पर चर्चा जारी है। एक बार जब इसे अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि और भारत के वाणिज्य मंत्रालय से मंजूरी मिल जाएगी, तो इसे अंतिम मंजूरी के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास भेजा जाएगा।
बीते कुछ महीनों में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच कई बार फोन पर बातचीत हुई है। माना जा रहा है कि इन बातचीतों में प्रस्तावित व्यापार समझौते की रूपरेखा पर चर्चा हुई। दावोस में राष्ट्रपति ट्रंप ने भी भारत और अमेरिका के बीच एक मजबूत व्यापार समझौते पर भरोसा जताया था।
इस लंबे समय से प्रतीक्षित समझौते का एक बड़ा असर यह हो सकता है कि अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर लगाया गया 50 प्रतिशत टैरिफ हटाया जाए। यह शुल्क पिछले साल गर्मियों से लागू है। इस शुल्क का सबसे ज्यादा असर भारतीय वस्त्र उद्योग पर पड़ा है। हालांकि अधिकारियों ने बताया कि इसके बावजूद दोनों देशों के बीच कुल व्यापार में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
आंकड़ों के भीतर स्थिति मिली-जुली रही है। वस्त्र और परिधान क्षेत्र पर दबाव बना रहा, हालांकि कुछ कपड़ा श्रेणियों में मामूली बढ़ोतरी भी देखी गई। दवा उद्योग के निर्यात में भी ऐसा ही रुझान रहा। कुल मिलाकर निर्यात की मात्रा बढ़ी है।
इन बातचीतों के बीच अमेरिका में कानूनी अनिश्चितता भी एक चिंता का विषय बनी हुई है। अधिकारियों ने कहा कि टैरिफ अधिकारियों के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट का संभावित फैसला सीधे तौर पर बातचीत को प्रभावित नहीं कर रहा है। लेकिन यह भविष्य में एक जोखिम बना हुआ है।
अधिकारियों के अनुसार अमेरिकी कांग्रेस में भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर समर्थन मजबूत बना हुआ है। दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने आर्थिक रिश्तों को और मजबूत करने की बात कही है।
इसी समय, अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि इमिग्रेशन से जुड़े घटनाक्रमों ने बिजनेस के माहौल को प्रभावित किया है। कुछ कुशल कामगार वीजा पर शुल्क बढ़ाए जाने से कंपनियों और पेशेवरों में चिंता है। भले ही ये मुद्दे सीधे व्यापार समझौते का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन इससे दोनों देशों के रिश्तों को लेकर धारणा जरूर प्रभावित होती है।
सूत्रों के मुताबिक, अगर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट कोई ऐसा फैसला देता है, जिससे कुछ शुल्कों की कानूनी वैधता प्रभावित होती है, तो अमेरिका को दूसरे कानूनी प्रावधानों का सहारा लेना पड़ सकता है। इन प्रावधानों में शुल्क की सीमा और अवधि पर सख्त नियम होते हैं, जिससे व्यापार नीति से जुड़ी मौजूदा राजनीतिक सोच पर असर पड़ सकता है।
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