पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव : भरतपुर का इतिहास, समझें समीकरण और सियासत

नई दिल्ली, 10 फरवरी (khabarwala24)। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले मुर्शिदाबाद जिले की भरतपुर सीट एक बार फिर राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में है। इस सीट का दिलचस्प इतिहास, बदलते जनसांख्यिकीय समीकरण, सीमावर्ती स्थिति और हालिया राजनीतिक घटनाक्रम इसे राज्य की सबसे दिलचस्प और संवेदनशील सीटों में शामिल करते हैं।भरतपुर विधानसभा क्षेत्र मुर्शिदाबाद जिले […]

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नई दिल्ली, 10 फरवरी (khabarwala24)। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले मुर्शिदाबाद जिले की भरतपुर सीट एक बार फिर राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में है। इस सीट का दिलचस्प इतिहास, बदलते जनसांख्यिकीय समीकरण, सीमावर्ती स्थिति और हालिया राजनीतिक घटनाक्रम इसे राज्य की सबसे दिलचस्प और संवेदनशील सीटों में शामिल करते हैं।

भरतपुर विधानसभा क्षेत्र मुर्शिदाबाद जिले के मध्य भाग में स्थित है और बरहामपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है। यह क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण है, जहां 92.49 प्रतिशत ग्रामीण और केवल 7.51 प्रतिशत शहरी मतदाता हैं। इसमें पूरा भरतपुर-2 सामुदायिक विकास ब्लॉक और भरतपुर-1 ब्लॉक की पांच ग्राम पंचायतें शामिल हैं। भागीरथी और उसकी सहायक नदियों से सिंचित उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी के कारण यहां की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है। धान, जूट और सब्जियां प्रमुख फसलें हैं।

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भरतपुर सड़क मार्ग से बहरामपुर, कृष्णानगर और कोलकाता से जुड़ा है। रेल संपर्क बेलडांगा और बहरामपुर कोर्ट स्टेशनों के माध्यम से उपलब्ध है। बांग्लादेश की सीमा की निकटता इस क्षेत्र को रणनीतिक और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है।

भरतपुर का नाम भारतीय सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा माना जाता है। ‘भरत’ शब्द भारतीय पहचान और पौराणिक परंपराओं से जुड़ा है। इसका शाब्दिक अर्थ ‘भरत का नगर’ है। दिलचस्प बात यह है कि प्राचीन हिंदू विरासत वाले इस क्षेत्र की वर्तमान जनसंख्या संरचना मुस्लिम बहुल हो चुकी है।

भरतपुर विधानसभा क्षेत्र की स्थापना 1951 में हुई थी और तब से यह हर विधानसभा चुनाव का हिस्सा रहा है। इस सीट का राजनीतिक इतिहास बेहद रोचक रहा है। यहां से रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) ने 9 बार, कांग्रेस ने 6 बार, सीपीआई (एम) ने 1 बार और तृणमूल कांग्रेस ने 1 बार जीत दर्ज की है।

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आरएसपी के ईद मोहम्मद ने 1991 से 2011 तक लगातार पांच बार जीत दर्ज कर क्षेत्र पर मजबूत पकड़ बनाए रखी। वहीं, सत्यपदा भट्टाचार्य चार कार्यकाल तक विधायक रहे। 2011 के बाद से यहां वामपंथ की पकड़ कमजोर हुई और सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले का दौर शुरू हुआ।

2011 के चुनाव में आरएसपी ने कांग्रेस को दो हजार से भी कम वोटों के अंतर से हराया। इसके बाद, 2016 के चुनाव में कांग्रेस ने तृणमूल कांग्रेस को हराया। वहीं, 2021 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के हुमायूं कबीर ने भाजपा के इमान कल्याण मुखर्जी को हराया।

भरतपुर मुस्लिम बहुल क्षेत्र है और पिछले वर्षों में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या में वृद्धि हुई है, जबकि हिंदू और अन्य समुदाय अल्पसंख्यक हो गए हैं। सीमापार आवाजाही और जनसंख्या संतुलन में बदलाव भी यहां की राजनीति को प्रभावित करने वाला बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।

इस बार भरतपुर में मुकाबला पहले से ज्यादा दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस ने मौजूदा विधायक हुमायूं कबीर को विवादों के कारण निलंबित कर दिया है, जो अपने आप में एक चुनौती है। इन सब के बीच, कांग्रेस मुस्लिम वोट बैंक पर पारंपरिक पकड़ को मजबूत करने और तृणमूल से नाराज मतदाताओं को साधने की रणनीति में जुट गई है। इन सब के बीच, हिंदू मतदाताओं की घटती संख्या भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है।

भरतपुर सीमावर्ती और संवेदनशील क्षेत्र होने के साथ-साथ एक मुस्लिम बहुल सीट है। यहां वाम, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस का ऐतिहासिक प्रभाव है।

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