नई दिल्ली, 10 अक्टूबर (khabarwala24)। बॉलीवुड की जब भी बात होती है, तो चर्चा अक्सर पर्दे पर चमकते सितारों की होती है। मगर पर्दे के पीछे भी कुछ ऐसे नाम होते हैं, जिन्होंने सिनेमा को नई दिशा दी। गुलशन राय उन्हीं में से एक थे।
गुलशन राय का जन्म लाहौर में हुआ था, लेकिन बंटवारे के बाद वह मुंबई आ गए। फिल्म इंडस्ट्री में उन्होंने अपने सफर की शुरुआत एक डिस्ट्रीब्यूटर के तौर पर की। उन्होंने फिल्मों की नब्ज समझी। बाजार की मांग जानी और फिर एक ऐसे प्रोड्यूसर बने, जिनकी फिल्में ‘हिट’ की गारंटी मानी जाती थीं।
1970 में गुलशन राय ने ‘त्रिमूर्ति फिल्म्स’ की स्थापना की। इसी बैनर के तहत उनकी पहली फिल्म बनी ‘जॉनी मेरा नाम’, जिसमें देवानंद लीड रोल में थे। फिल्म का निर्देशन विजय आनंद ने किया था। फिल्म ने बड़ी सफलता हासिल की और यहीं से गुलशन राय का प्रोड्यूसर के रूप में असली सफर शुरू हुआ।
गुलशन राय ने 70 और 80 के दशक में कई ब्लॉकबस्टर फिल्में प्रोड्यूस कीं। यश चोपड़ा जैसे दिग्गज निर्देशक ने गुलशन राय की कई फिल्मों का निर्देशन किया।
‘दीवार’, ‘त्रिशूल’ जैसी फिल्में अमिताभ बच्चन के करियर में मील का पत्थर साबित हुईं और इनमें गुलशन राय का अहम योगदान था। उनके बैनर तले बनी फिल्मों में से कई ने हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर की पहचान तय की।
गुलशन राय के बेटे राजीव राय ने भी अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाया और निर्देशक के रूप में कई फिल्में बनाईं, लेकिन हर रिश्ते में मतभेद की गुंजाइश होती है और फिल्म ‘मोहरा’ बनाते वक्त दोनों के रिश्तों में खटास आ गई। दरअसल राजीव राय ने जब ‘मोहरा’ के लिए अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी जैसे नए चेहरों को साइन किया तो गुलशन राय नाखुश थे। वह ऐसे निर्माता रहे थे जिन्होंने हमेशा बड़े सितारों के साथ काम किया था। इसलिए उन्होंने नए अभिनेताओं पर दांव लगाने से हिचकिचाहट दिखाई।
हालांकि, फिल्म के राइटर शब्बीर बॉक्सवाला ने गुलशन राय को इन दोनों अभिनेताओं के लिए मनाया। इस बारे में मीडिया में बहुत सारी कहानियां छापी गई थीं।
यही नहीं, ‘मोहरा’ की कहानी भी एक दिलचस्प मोड़ से शुरू हुई। बताया जाता है कि गुलशन राय और शब्बीर बॉक्सवाला एक ही जिम में जाते थे। वहीं वर्कआउट के दौरान शब्बीर को एक एक्शन थ्रिलर की कहानी सूझी और वहीं से ‘मोहरा’ की पटकथा लिखी गई।
गुलशन राय का फिल्मी सफर कई दशक तक फैला रहा। उन्होंने ‘दीवार’, ‘ड्रीमगर्ल’, ‘त्रिशूल’, ‘युद्ध’, ‘त्रिदेव’, ‘विश्वात्मा’, ‘गुप्त’ और ‘असंभव’ जैसी फिल्मों में अपना रोल निभाया और हिंदी सिनेमा की धड़कनों में खुद को रच-बसाया।
लंबी बीमारी के बाद 11 अक्टूबर 2004 को मुंबई में 80 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। उनकी उपलब्धियों के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया था।
Source : IANS
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