Khabarwala24 Prayagraj News: उत्तर प्रदेश की न्यायिक राजधानी प्रयागराज में फर्जी एलएलबी (LLB) डिग्रियों और कूटरचित (जाली) अंकपत्रों के आधार पर राज्य बार काउंसिल में पंजीकरण कराकर वर्षों से अदालतों में बहस कर रहे कथित अधिवक्ताओं के खिलाफ एक बहुत बड़ा भंडाफोड़ हुआ है। उत्तर प्रदेश बार काउंसिल द्वारा कराए गए शैक्षणिक दस्तावेजों के सघन सत्यापन (वेरिफिकेशन) के दौरान करीब 100 ऐसे लोगों की पहचान हुई है जो बिना कानून की पढ़ाई पूरी किए ही काला कोट पहनकर अदालतों में प्रैक्टिस कर रहे थे।
इस गंभीर मामले में प्राथमिक आधार पर यूपी बार काउंसिल के सचिव आरके शुक्ला की शिकायत पर प्रयागराज के सिविल लाइंस थाने में 26 फर्जी वकीलों के खिलाफ नामजद प्राथमिकी (FIR) दर्ज करा दी गई है। बाकी बचे अन्य संदिग्धों के विरुद्ध भी अलग-अलग मामले दर्ज करने की प्रक्रिया जारी है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश से खुला फर्जीवाड़े का बड़ा पिटारा (Prayagraj News)
इस पूरे आपराधिक नेटवर्क का खुलासा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक ऐतिहासिक आदेश के बाद शुरू हुई जांच से हुआ है। दरअसल, ‘कफील बनाम स्टेट ऑफ यूपी व अन्य’ से जुड़े एक मामले में सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 3 जून, 2026 को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया था। उच्च न्यायालय ने राज्य बार काउंसिल में पंजीकृत एक अधिवक्ता की डिग्री संदिग्ध पाए जाने पर उसका तुरंत सत्यापन कराने और जांच में गड़बड़ी पाए जाने पर सख्त कानूनी कार्रवाई करते हुए एफआईआर दर्ज कराने का स्पष्ट निर्देश दिया था।
न्यायालय के इस कड़े रुख के बाद जब बार काउंसिल ने त्वरित कार्रवाई करते हुए संबंधित अधिवक्ता के दस्तावेजों की पड़ताल शुरू की, तो फर्जीवाड़े की पूरी परतें एक-एक कर उधड़ने लगीं।
विश्वविद्यालय की जांच रिपोर्ट में खुली पोल, पिलानी से लेकर तमिलनाडु तक फर्जीवाड़ा (Prayagraj News)
बार काउंसिल के अभिलेखों के अनुसार, लखनऊ के निवासी एक कथित अधिवक्ता ने सर्टिफिकेट ऑफ प्रैक्टिस (COP) हासिल करने के लिए आवेदन दिया था। अपने आवेदन के साथ उन्होंने वर्ष 2013 की स्नातक और एलएलबी की डिग्री तथा अंकपत्र संलग्न किए थे। जब काउंसिल ने इन दस्तावेजों की सत्यता जांचने के लिए राजस्थान के पिलानी स्थित श्रीधर विश्वविद्यालय को प्रतिलिपियां भेजीं, तो विश्वविद्यालय प्रशासन ने आधिकारिक रिपोर्ट में स्पष्ट कर दिया कि संबंधित मार्कशीट और डिग्री उनके रिकॉर्ड में पंजीकृत ही नहीं हैं और वे पूरी तरह जाली हैं।
विश्वविद्यालय से रिपोर्ट मिलते ही बार काउंसिल ने आरोपी को कारण बताओ नोटिस जारी किया और उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करा दिया। इसी तर्ज पर जब अन्य संदिग्ध वकीलों की डिग्रियों की पड़ताल की गई, तो देश भर के कई प्रतिष्ठित और निजी शिक्षण संस्थानों के नाम पर जारी की गई फर्जी डिग्रियों का पर्दाफाश हुआ। जिन प्रमुख विश्वविद्यालयों के नाम पर जारी प्रमाणपत्र फर्जी पाए गए हैं, उनमें शामिल हैं:
- श्रीधर विश्वविद्यालय (पिलानी, राजस्थान)
- एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय (बरेली, उत्तर प्रदेश)
- स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय (मेरठ, उत्तर प्रदेश)
- स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय (गुरुग्राम, हरियाणा)
- तिरुवल्लुवर विश्वविद्यालय (तमिलनाडु)
जब इन सभी विश्वविद्यालयों को सत्यापन हेतु पत्र भेजे गए, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखित जवाब दिया कि ये डिग्रियां और अंकपत्र उनके संस्थान द्वारा कभी जारी ही नहीं किए गए।
सिविल लाइंस पुलिस ने शुरू की जांच, प्रत्येक आरोपी पर अलग-अलग केस दर्ज (Prayagraj News)
प्रयागराज के सिविल लाइंस थाने में बार काउंसिल की ओर से लगभग 100 फर्जी वकीलों के खिलाफ लिखित तहरीर दी जा चुकी है। मामलों की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस प्रशासन हर आरोपी के खिलाफ अलग-अलग केस पंजीकृत कर रहा है।
प्रयागराज के सिविल लाइंस क्षेत्र के सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) विद्युत गोयल ने बताया कि बार काउंसिल से फर्जी दस्तावेजों से जुड़ी कई शिकायतें प्राप्त हुई हैं। शिकायतों के साथ संलग्न जांच रिपोर्टों के आधार पर सुसंगत धाराओं में एफआईआर दर्ज की जा रही हैं। उन्होंने बताया कि पुलिस अब इस बात की गहन जांच करेगी कि इन आरोपियों ने यह जाली मार्कशीट और डिग्रियां किस माध्यम या गिरोह के जरिए हासिल की थीं। जांच के दौरान आरोपियों को पूछताछ के लिए समन किया जाएगा और फर्जी दस्तावेज बनाने वाले अंतरराज्यीय रैकेट या दलालों का पता लगाकर उन्हें भी गिरफ्तार किया जाएगा।
कानून की नजर में फर्जी डिग्री पर वकालत करना कितना गंभीर अपराध? (Prayagraj News)
भारतीय विधिक प्रणाली में बिना मान्य विधि स्नातक (LLB) डिग्री के न्यायालयों में वकालत करना एक अत्यंत संगीन और गैर-जमानती श्रेणी का अपराध माना जाता है। यह सीधे तौर पर देश की न्याय व्यवस्था, वादकारियों (क्लाइंट्स) और न्यायपालिका के साथ किया गया बहुत बड़ा विश्वासघात है।
वर्तमान में ऐसे मामलों में शामिल आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धोखाधड़ी, कूटरचना (फॉरजरी), और जाली दस्तावेजों को असली के रूप में इस्तेमाल करने की गंभीर धाराओं के तहत मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं।
इसके अतिरिक्त, एडवोकेट्स एक्ट 1961 की धारा 45 के अंतर्गत यह स्पष्ट प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति जो अदालतों में प्रैक्टिस करने के लिए कानूनी रूप से अधिकृत या हकदार नहीं है, फिर भी वह किसी न्यायालय में पैरवी या प्रैक्टिस करता हुआ पाया जाता है, तो उसे 6 महीने तक के कारावास की सजा सुनाई जा सकती है। इसके साथ ही बार काउंसिल ऐसे व्यक्तियों का पंजीकरण तत्काल प्रभाव से रद्द कर उन्हें हमेशा के लिए ब्लैकलिस्ट कर देती है, जिससे वे भविष्य में कभी भी विधिक क्षेत्र में प्रवेश न कर सकें।
देश में 35 से 40 फीसदी डिग्रियां संदिग्ध: बार काउंसिल ऑफ इंडिया का बड़ा दावा (Prayagraj News)
फर्जी वकीलों का यह संकट केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने पूर्व में एक चौंकाने वाला आकलन पेश करते हुए कहा था कि पूरे देश में प्रैक्टिस कर रहे कुल वकीलों में से लगभग 35 से 40 प्रतिशत की डिग्रियां या तो संदिग्ध हैं या फिर वे कूटरचित दस्तावेजों के सहारे वकालत के पेशे में घुसे हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने भी देश भर की अदालतों में फर्जी वकीलों की मौजूदगी पर गहरा असंतोष और चिंता व्यक्त की थी। सर्वोच्च अदालत ने पूरे देश के स्तर पर सभी पंजीकृत अधिवक्ताओं के शैक्षणिक दस्तावेजों का नए सिरे से अनिवार्य सत्यापन कराने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे अंतरराज्यीय फर्जी डिग्री सिंडिकेट की व्यापक जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से कराने का सुझाव भी दिया है।
फर्जी वकीलों द्वारा लड़े गए मुकदमों और न्याय प्रणाली पर असर (Prayagraj News)
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि किसी आपराधिक या दीवानी मामले में यह साबित हो जाता है कि पीड़ित या आरोपी पक्ष की पैरवी करने वाला व्यक्ति वास्तव में फर्जी वकील था, तो उस न्यायिक प्रक्रिया की वैधता पर बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है। ऐसी स्थिति में प्रभावित पक्ष अदालत के समक्ष याचिका दायर कर अपने केस की नए सिरे से सुनवाई (Re-hearing) करने और किसी अधिकृत व वैध अधिवक्ता के माध्यम से पक्ष रखने की गुहार लगा सकता है। न्याय प्रणाली की साख और जनता के भरोसे को बनाए रखने के लिए ही बार काउंसिल अब हर छोटे-बड़े जिले में दर्ज वकीलों के रिकॉर्ड्स की री-वेरिफिकेशन कर रही है।
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