मुंबई, 29 जनवरी (khabarwala24)। संवेदनशील और गंभीर मुद्दों पर फिल्में निर्माण के लिए मशहूर निर्माता-निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री की फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ की मेकिंग जर्नी बेहद चुनौतीपूर्ण रही। शूटिंग शुरू होने से ठीक पहले प्रोडक्शन डिजाइनर रजत पोद्दार का अचानक निधन हो या फिल्म को रिलीज के दौरान भारी विरोध, धमकियां, कोलकाता में हमले और पश्चिम बंगाल में अनऑफिशियल बैन, इन सबका सामना तक करना पड़ा।
विवेक रंजन ने khabarwala24 को दिए इंटरव्यू में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया, “साल 2025 मेरे लिए संघर्ष का साल रहा। फिल्म बनाना पहले से ही कठिन था, लेकिन शूटिंग शुरू होने से ठीक पहले प्रोडक्शन डिजाइनर रजत पोद्दार की अचानक मौत हो गई। यह घटना टीम के लिए बड़ा झटका थी, क्योंकि बड़े पैमाने पर भव्य सेट तैयार हो रहे थे। फिर भी टीम ने हिम्मत नहीं हारी और रजत पोद्दार के नाम पर विजन पूरा किया। सेट को भव्य तरीके से कंप्लीट कर फिल्म की शूटिंग पूरी की गई।”
फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ विवेक अग्निहोत्री की ‘फाइल्स’ ट्रायोलॉजी की तीसरी कड़ी है, जो ‘द ताशकंद फाइल्स’ और ‘द कश्मीर फाइल्स’ के बाद आई। यह फिल्म साल 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे, नोआखाली दंगों और विभाजन के दौरान हुए हिंदू नरसंहार की कहानी दिखाती है। ऐसे में रिलीज से पहले ही विवाद शुरू हो गया। फिल्म को लेकर इतना विरोध हुआ कि निर्देशक ने इसकी भी नहीं की थी।
उन्होंने बताया, ” ‘द बंगाल फाइल्स’ रिलीज के दौरान कोलकाता में हमले हुए, धमकियां मिलीं और ढेरों चुनौतियां सामने आईं। फिल्म को रिलीज न होने देने के लिए हर स्तर पर कोशिशें की गईं। पश्चिम बंगाल में फिल्म को अनऑफिशियल तरीके से रोक दिया गया। सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी) ने प्रमाणन दिया और केंद्र सरकार की एजेंसी होने के बावजूद राज्य में रिलीज नहीं हो पाई। थिएटर मालिकों पर दबाव डाला गया। पुलिस और राजनीतिक ताकतों से धमकियां मिलीं, जिससे कोई मल्टीप्लेक्स या सिनेमा हॉल फिल्म नहीं दिखा सका। देश की सबसे बड़ी एग्जीबिशन चेन भी बंगाल में इसे रिलीज नहीं कर पाईं। मीडिया, एक्टिविस्ट्स और कई संगठनों ने आवाज उठाई, लेकिन सब प्रयास विफल रहे।”
निर्देशक ने बताया, “मिडिल क्लास, किसान, मजदूर, सोशल एक्टिविस्ट, अच्छे पत्रकार और फिल्मकारों के प्रयासों के बावजूद कुछ ताकतें सब कुछ रोक देती हैं। इस पर गहरा शोध होना चाहिए। यह कहानी हिम्मत, सत्य की खोज और चुनौतियों का सामना करने की है। ‘द बंगाल फाइल्स’ ने साबित किया कि सच्चाई को दबाना आसान नहीं, लेकिन उसे सामने लाना भी उतना ही कठिन है। यह स्थिति लोकतंत्र और फ्री स्पीच के लिए बड़ी चुनौती है, जिन संस्थाओं को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए, वे ही इसमें नाकाम रहीं। मैं इसे सरकार की हार मानता हूं। फिल्ममेकर्स के लिए यह सबक है कि कितनी भी बड़ी ताकत हो, कुछ ऐसी शक्तियां हैं जिनके आगे सब फेल हो जाते हैं।”
विवेक ने अपनी किताब ‘अर्बन नक्सल’ का जिक्र करते हुए कहा, ” मैं अपनी किताब और लेख के जरिए ऐसी ताकतों के खिलाफ हमेशा आवाज उठाता रहा हूं, लेकिन इस घटना ने मुझे गहराई से प्रभावित किया। सवाल आता है कि नई जनरेशन इससे कैसे लड़ेगी और भारत का भविष्य क्या होगा? मैं खुश हूं कि इन तमाम चुनौतियों के बीच भी हमने हार नहीं मानी। फिल्म रिलीज हुई और जहां दिखी, वहां दर्शकों के दिल में बदलाव आया। लोगों को समस्या का बोध हुआ कि इतिहास ही नहीं, वर्तमान का सत्य भी दबाया जा रहा है।”
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