Khabarwala 24 News Bulandshahr: Bulandshahr News (प्रवीण शर्मा) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास ऐसे महान जननायकों की गाथाओं से भरा पड़ा है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने व्यक्तिगत सुख, समृद्ध करियर और संपत्ति का हंसते-हंसते त्याग कर दिया। उत्तर प्रदेश का बुलंदशहर जिला भी ऐसे ही एक अमर सेनानी बाबू ब्रिज बिहारी लाल का ऋणी है।
बाबू ब्रिज बिहारी लाल स्वतंत्रता आंदोलन के एक ऐसे कर्मठ और निष्ठावान योद्धा थे, जिन्होंने अपनी सफल वकालत से अर्जित धन को स्वतंत्रता संग्राम में झोंक दिया। उन्होंने न केवल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संगठन को बुलंदशहर में मजबूत किया, बल्कि भूमिगत सेनानियों की आर्थिक, कानूनी और व्यावहारिक मदद करके ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी।
प्रारंभिक जीवन, शिक्षा और वकालत की शुरुआत (Bulandshahr News)
बाबू ब्रिज बिहारी लाल का जन्म वर्ष 1889 में बुलंदशहर नगर के एक प्रतिष्ठित कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम बाबू भगवती सहाय था। शिक्षा के प्रति विशेष लगाव रखने वाले ब्रिज बिहारी लाल ने उच्च शिक्षा प्राप्त करते हुए एम.ए. (M.A.) और एल.एल.बी. (LL.B.) की डिग्री हासिल की।
शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत, वर्ष 1919 में उन्होंने बुलंदशहर जिला न्यायालय में फौजदारी (क्रिमिनल) वकील के रूप में अपना प्रैक्टिस शुरू किया। उनकी कुशाग्र बुद्धि और सटीक कानूनी तर्कों के कारण जल्द ही उनकी गिनती जिले के शीर्ष अधिवक्ताओं में होने लगी। वर्ष 1919 से लेकर 1942 तक उन्होंने लगातार 23 वर्षों तक सफलतापूर्वक वकालत की।

महात्मा गांधी के आह्वान पर असहयोग आंदोलन से जुड़ाव (Bulandshahr News)
वर्ष 1920 में जब महात्मा गांधी ने देशव्यापी ‘असहयोग आंदोलन’ की शुरुआत की, तो बाबू ब्रिज बिहारी लाल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्होंने अपनी वकालत के साथ-साथ स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों में खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया।
उनकी अद्भुत संगठनात्मक क्षमता और राष्ट्रसेवा के जज्बे को देखते हुए उन्हें जल्द ही बुलंदशहर जिला कांग्रेस कमेटी के अग्रणि और प्रमुख नेताओं में स्थान मिला। उन्होंने जिले के कोने-कोने में जाकर युवाओं और ग्रामीणों को आजादी की लड़ाई से जोड़ने का काम किया।
नगरपालिका अध्यक्ष से संयुक्त प्रांत (UP) की विधानसभा तक का सफर (Bulandshahr News)
बाबू ब्रिज बिहारी लाल का प्रभाव केवल न्यायशास्त्र तक सीमित नहीं था, बल्कि जनसेवा के क्षेत्र में भी उनका बड़ा नाम था:
- नगरपालिका बोर्ड के अध्यक्ष (1928): वर्ष 1928 में वे बुलंदशहर नगरपालिका बोर्ड के अध्यक्ष चुने गए। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने नगर के विकास और नागरिकों की सुविधाओं के लिए अनेक दूरगामी कार्य किए।
- विधानसभा सदस्य (1937): भारत सरकार अधिनियम-1935 के तहत वर्ष 1937 में जब देश में पहली बार प्रांतीय चुनाव हुए, तब वे बुलंदशहर से संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) की विधानसभा के सदस्य (MLA) चुने गए।
संसदीय राजनीति में रहते हुए भी उन्होंने कभी अपने मूल उद्देश्य ‘देश की आजादी’ को ओझल नहीं होने दिया और विधानसभा में जनहित तथा स्वतंत्रता संग्राम के समर्थन में पुरजोर आवाज उठाई।
क्रांतिकारियों के लिए ‘कानूनी ढाल’ और आर्थिक मददगार (Bulandshahr News)
बुलंदशहर जिला बार के शीर्ष फौजदारी वकील होने के नाते बाबू ब्रिज बिहारी लाल की अच्छी-खासी कमाई होती थी। लेकिन उन्होंने अपनी वकालत को धन संचय का साधन बनाने के बजाय स्वतंत्रता आंदोलन का वित्त पोषण करने का जरिया बनाया:
- मुफ्त कानूनी सहायता: ब्रिटिश शासन के दौरान जो भी स्वतंत्रता सेनानी या क्रांतिकारी पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाते थे, बाबू ब्रिज बिहारी लाल अदालतों में बिना कोई पेशेवर फीस (शुल्क) लिए उनका मुकदमा लड़ते थे।
- आर्थिक मदद: वे अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस के प्रांतीय कोष में दान करते थे।
- सेनानियों के परिवारों का सहारा: जेल गए स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों के भरण-पोषण और बच्चों की शिक्षा का खर्च भी वे गुप्त रूप से उठाते थे।
यही कारण था कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के स्वतंत्रता सेनानी उन्हें अपना सबसे भरोसेमंद कानूनी सलाहकार और संरक्षक मानते थे।

‘नलगढ़ा फार्म’: ब्रिटिश सीआईडी की नजर में क्रांतिकारियों का सुरक्षित ठिकाना (Bulandshahr News)
यमुना नदी के दक्षिणी तट पर स्थित नलगढ़ा में बाबू ब्रिज बिहारी लाल का एक विशाल कृषि फार्म था। यह फार्म ब्रिटिश हुकूमत से छिपकर काम करने वाले भूमिगत क्रांतिकारियों, गुप्त बैठकों और राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह बन गया था। ब्रिटिश पुलिस से बचकर भागने वाले सेनानियों को यहां भोजन, विश्राम और छिपने की सुरक्षित जगह मिलती थी।
नलगढ़ा फार्म पर ब्रिटिश सीआईडी का छापा (1930) (Bulandshahr News)
ब्रिटिश गुप्तचर विभाग (CID) को जब इस बात की भनक लगी, तो 7 नवंबर 1930 को पुलिस और खुफिया विभाग की टीम ने नलगढ़ा फार्म पर भारी दल-बल के साथ छापा मारा।
- तलाशी के दौरान पुलिस ने फार्म से कई हथियार और प्रतिबंधित राष्ट्रीय साहित्य जब्त किया।
- गुस्से में आई ब्रिटिश घुड़सवार पुलिस ने फार्म में खड़ी पूरी फसल को रौंदकर नष्ट कर दिया।
- इसके बाद फार्म को कई महीनों तक सैन्य पुलिस की निगरानी में रखा गया।
इस ऐतिहासिक घटना का विस्तृत उल्लेख राष्ट्रीय अभिलेखागार (National Archives of India), नई दिल्ली में सुरक्षित ब्रिटिश गुप्तचर रिपोर्टों में आज भी दर्ज है।
‘भारत छोड़ो आंदोलन’ और जेल में शहादत (Bulandshahr News)
8 अगस्त 1942 को मुंबई के ऐतिहासिक गोवालिया टैंक मैदान से महात्मा गांधी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का आह्वान किया और देशवासियों को ‘करो या मरो’ का मंत्र दिया। इस आह्वान के साथ ही पूरे देश में क्रांति की लहर दौड़ गई और ब्रिटिश सरकार ने दमनचक्र चलाते हुए प्रमुख नेताओं की धरपकड़ शुरू कर दी।
अगस्त 1942 में बाबू ब्रिज बिहारी लाल को बुलंदशहर के नलगढ़ा क्षेत्र से ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। यह उनके राजनीतिक जीवन की पहली सीधी गिरफ्तारी थी।
- मुकदमा व सजा: उन पर ‘भारत रक्षा नियम, 1939’ (Defence of India Rules) के तहत मुकदमा चलाया गया। 24 सितंबर 1942 को अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए तीन माह के कठोर कारावास की सजा सुनाई।
- अंतिम सांस और शहादत: सजा काटने के दौरान बुलंदशहर जिला कारागार की अमानवीय परिस्थितियों और बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण उनका निधन हो गया। उस समय उनकी आयु मात्र 53 वर्ष थी।
देश की आजादी का सपना आंखों में संजोए इस महान सेनानी ने कारागार की सलाखों के पीछे देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
स्वतंत्र भारत में सम्मान और अमिट विरासत (Bulandshahr News)
आजादी के बाद उत्तर प्रदेश सरकार और स्थानीय प्रशासन ने बाबू ब्रिज बिहारी लाल के बलिदान को सम्मानपूर्वक स्वीकार किया:
- सरकारी मान्यता (1956): 22 जून 1956 को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन संसदीय सचिव बनारसी दास ने उन्हें 1942 के आंदोलन में सक्रिय रहते हुए शहीद हुए वरिष्ठ कांग्रेस नेता के रूप में आधिकारिक रूप से सम्मानित किया।
- इतिहास में स्थान: उनका नाम उत्तर प्रदेश सरकार के सूचना विभाग की ‘स्वतंत्रता सेनानी’ संबंधी आधिकारिक पुस्तकों और बुलंदशहर के विभिन्न ऐतिहासिक स्मृति-ग्रंथों में दर्ज है।
- स्मारक द्वार (2003): 6 दिसंबर 2003 को बुलंदशहर नगर में उनके ऐतिहासिक योगदान की स्मृति में एक भव्य स्मारक द्वार का निर्माण कराया गया, जिसका उद्घाटन तत्कालीन जिला न्यायाधीश ने किया था।
बाबू ब्रिज बिहारी लाल का जीवन यह अमर संदेश देता है कि आजादी केवल सत्याग्रहों और भाषणों से नहीं मिली, बल्कि इसमें अनगिनत वीरों के आर्थिक त्याग, कानूनी लड़ाई, व्यक्तिगत सुखों के बलिदान और प्राणों की आहुति का अमूल्य योगदान रहा है। बुलंदशहर की माटी अपने इस अमर सपूत के चरणों में सदैव नतमस्तक रहेगी।
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