नई दिल्ली, 4 अक्टूबर (khabarwala24)। एक शूरवीर नारी रानी दुर्गावती ने अपने देश और स्वाभिमान की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति दी और इतिहास के पन्नों में अमर हो गईं। उनकी वीरता, साहस और बलिदान की गाथा आज भी प्रेरणा देती है।
रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर, 1524 को उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्थित कालिंजर के अभेद्य किले में हुआ। दुर्गाष्टमी के दिन जन्म होने के कारण उनके माता-पिता ने उनका नाम दुर्गावती रखा।
बचपन से ही दुर्गावती की रगों में युद्ध का जुनून दौड़ता था। पिता के साथ जंगलों में शिकार, तीरंदाजी की साधना, घुड़सवारी का अभ्यास, ये सब उनके दैनिक जीवन का हिस्सा थे। इतिहासकार बताते हैं कि वह इतनी निपुण तीरंदाज थीं कि एक ही बाण से दो पक्षियों को भेद सकती थीं। उनकी शिक्षा में वेद-शास्त्रों के साथ-साथ राज्यनीति और कला भी शामिल थी, जो उन्हें एक परिपूर्ण शासिका बनाती।
मात्र 18 वर्ष की आयु में उनकी शादी गढ़ा-कटंगा के गोंड राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपत शाह से हुई।
‘अकबरनामा’ के अनुसार, 1548 में दलपत शाह के निधन के बाद उनके नाबालिग पुत्र बीर नारायण को उत्तराधिकारी बनाया गया। रानी ने इस कठिन समय में शासन की कमान संभाली। ‘आइने अकबरी’ में अबुल फजल ने लिखा है कि रानी न केवल भाला और बंदूक चलाने में निपुण थीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक भी थीं। उनका साम्राज्य 300 मील लंबा और 160 मील चौड़ा था, जिसमें सिवनी, पन्ना, छिंदवाड़ा, भोपाल, नर्मदापुरम, बिलासपुर, डिंडौरी, मंडला, नरसिंहपुर, कटनी और नागपुर जैसे क्षेत्र शामिल थे।
रानी दुर्गावती का शासन काल गोंडवाना के स्वर्णिम युग का प्रतीक था। उन्होंने राजधानी चौरागढ़ को सिंगारगढ़ स्थानांतरित किया, जहां दुर्ग की मजबूती ने दुश्मनों को कदम पीछे धकेल दिया। सेना का पुनर्गठन किया। हाथी दस्ता, घुड़सवार और पैदल सैनिकों को आधुनिक हथियारों से लैस किया। लेकिन रानी केवल योद्धा ही नहीं, एक संवेदनशील शासिका भी थी। उन्होंने अनेक मंदिर, धर्मशालाएं, तालाब और सरायें बनवाईं। पशुबलि पर प्रतिबंध लगाया, किसानों को करों में छूट दी और जनजातीय समुदायों को एकजुट किया। उनके दरबार में न्याय की घंटी सदा बजती रहती, जहां कोई भी प्रजा अपनी पीड़ा सुना सकता था।
इतिहासकार राजगोपाल सिंह वर्मा अपनी पुस्तक ‘दुर्गावती: गढ़ा की पराक्रमी रानी’ में लिखते हैं कि दुर्गावती का शासन ‘एक मातृसत्तात्मक राज्य’ था, जहां नारी सशक्तिकरण कोई नारा नहीं, वास्तविकता था।
‘तारीख-ए-फरिश्ता’ के अनुसार, रानी दुर्गावती ने 1555 और 1560 में मालवा के शासक बाज बहादुर के हमलों को विफल किया। पहली लड़ाई में बाज बहादुर के काका फतेह खां मारे गए और दूसरी बार कटंगी घाटी में उनकी सेना का सफाया हुआ। इन विजयों ने रानी को गढ़ा-मंडला की अपराजेय शासक बनाया। हालांकि, मुगल सूबेदार आसफ खां ने पहले मित्रता का दिखावा किया, फिर जासूसों के जरिए रानी के खजाने की जानकारी हासिल की। ‘भारत में मुगल शासन’ में दर्ज है कि आसफ खां ने 10 हजार घुड़सवारों, पैदल सैनिकों और तोपखाने के साथ गढ़ा-कटंगा पर हमला किया। मंत्रियों ने रानी को पीछे हटने और संधि की सलाह दी, लेकिन रानी ने अपमान के साथ जीने के बजाय सम्मान के साथ मरना चुना।
रानी दुर्गावती ने केवल 500 सैनिकों के साथ मुगल सेना का मुकाबला किया। ‘मध्य प्रदेश जिला गजेटियर्स: जबलपुर’ के अनुसार, उनकी छोटी टुकड़ी ने 300 मुगल सैनिकों को मार गिराया। रानी ने रात में हमले की रणनीति बनाई पर सेनापतियों की असहमति के कारण यह लागू न हो सकी। अगले दिन, आसफ खां ने तोपों के साथ हमला तेज किया। रानी अपने प्रिय हाथी ‘सरमन’ पर सवार होकर युद्ध में उतरीं।
उनके पुत्र बीर नारायण और स्वयं रानी ने मुगलों को तीन बार पीछे धकेला, लेकिन बीर नारायण घायल हो गए। रानी भी दो तीरों से जख्मी हो गईं। जब रानी को लगा कि वह शत्रुओं के हाथों में पड़ सकती हैं, उन्होंने अपने खंजर से स्वयं को बलिदान कर लिया।
24 जून 1564 को रानी दुर्गावती ने युद्धभूमि में वीरगति प्राप्त की। बाद में जबलपुर से 12 मील दूर एक संकरे पहाड़ी दर्रे में उनके सैनिकों ने उनका अंतिम संस्कार किया। रानी दुर्गावती का बलिदान आज भी स्वाभिमान और साहस का प्रतीक है।
Source : IANS
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