मुंबई, 14 सितंबर (khabarwala24)। आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास में कुछ लेखक ऐसे हैं, जिनकी आभा ने कई विधाओं को रोशन किया है। इन्हीं में से एक हैं डॉ. रामकुमार वर्मा, जिन्हें ‘एकांकी सम्राट’ के रूप में जाना जाता है।
डॉ. रामकुमार वर्मा का जन्म मध्य प्रदेश के सागर जिले में 15 सितंबर 1950 को हुआ। इनके पिता लक्ष्मी प्रसाद वर्मा डिप्टी कलेक्टर थे। रामकुमार वर्मा हिंदी साहित्य जगत के प्रसिद्ध कवि, नाटककार, साहित्यकार और आलोचक थे। वे छायावादोत्तर युग के महत्त्वपूर्ण रचनाकारों में गिने जाते हैं। उनकी रचनाओं में इतिहास, सामाजिक चेतना और राष्ट्रीयता की झलक मिलती है।
वे विशेष रूप से अपने नाटकों के लिए प्रसिद्ध रहे, जिन्हें ‘आधुनिक हिंदी एकांकी नाटकों के जनक’ भी कहा जाता है। उनकी भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और भावनाओं से परिपूर्ण होती थी। उन्होंने ‘पृथ्वीराज की आंखें’, ‘रेशमी टाई’, ‘रजतरश्मि’, ‘ऋतुराज’, ‘दीपदान’, ‘चारुमित्रा’, ‘विभूति’, ‘सप्तकिरण’, ‘रूपरंग’, ‘जूही के फूल’ जैसे नाटक लिखे थे।
रामकुमार वर्मा को उपन्यास ‘चित्ररेखा’ के लिए देव पुरस्कार एवं एकांकी संग्रह पर अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन पुरस्कार मिला। उनको भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से भी सम्मानित किया जा चुका है।
उन्होंने हिंदी की लघु नाट्य परंपरा को एक नई दिशा दी और नाट्य साहित्य को आम जन-जीवन के करीब पहुंचाया। रामकुमार वर्मा ने हिंदी एकांकी कला को एक नया संरचनात्मक आदर्श दिया, जिसमें उन्होंने भारतीय आत्मा और पाश्चात्य तकनीक का अद्भुत समन्वय किया। सन् 1930 में, उन्होंने ‘बादल की मृत्यु’ नामक अपना पहला एकांकी लिखा, जो फेंटेसी के रूप में अत्यंत लोकप्रिय हुआ। यह रचना न केवल उनके एकांकी लेखन की शुरुआत थी, बल्कि इसने हिंदी एकांकी को एक नए मुकाम पर पहुंचा दिया। उन्होंने एकांकी में मनोविज्ञान के अनेकानेक स्तरों पर मानव-जीवन की विविध संवेदनाओं को स्वर दिया।
रामकुमार वर्मा की कलम से लेखन की कोई विधा अछूती नहीं रही। उनकी सृजनशीलता का दस्तावेज उनकी 101 से अधिक कृतियां हैं। आलोचकों के अनुसार, वे कभी कवि, तो कभी नाटककार, कभी संपादक, तो कभी शोधकर्ता और साहित्य के इतिहास लेखक के रूप में सामने आए। कुछ आलोचक तो यहां तक कहते हैं कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद अगर किसी ने प्रामाणिक हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा है, तो वे डॉ. रामकुमार वर्मा ही हैं।
रामकुमार वर्मा ने अपने एकांकी नाटकों में दो मुख्य विषयों को उठाया—ऐतिहासिक और सामाजिक। उनके ऐतिहासिक एकांकी भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों से प्रेरित थे, जिसमें उन्होंने ऐसे चरित्रों की रूपरेखा प्रस्तुत की जो पाठकों में उच्च चारित्रिक संस्कार भर सकें। उनके इन नाटकों में भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना के स्वर बखूबी समाहित थे। वहीं, उनके सामाजिक एकांकी प्रेम और मानसिक अंतर्द्वंद की समस्याओं से संबंधित थे, जो यथार्थवादी कलेवर में जीवन की वस्तु-स्थिति तक पहुंचते हैं। हालांकि, इन एकांकियों में उनकी आदर्शवादी सोच इतनी गहरी थी कि कभी-कभी उनके पात्र आदर्श के लिए प्रेम और जीवन का मोह त्याग कर उत्सर्ग कर बैठते थे।
इस प्रकार, डॉ. रामकुमार वर्मा ने हिंदी साहित्य में एक ऐसा आदर्श स्थापित किया, जो आज भी प्रासंगिक है। उनकी रचनाएं यह साबित करती हैं कि लेखन की कोई एक विधा उनकी प्रतिभा को परिभाषित नहीं कर सकती, बल्कि उन्होंने हर विधा में अपनी एक अमिट छाप छोड़ी।
Source : IANS
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