उज्जायी: कफ-वात नाशक और अग्नि जाग्रत करने वाला प्राणायाम, जानें लाभ

नई दिल्ली, 1 जनवरी (khabarwala24)। अक्सर हम योग और प्राणायाम को सिर्फ शारीरिक व्यायाम समझ लेते हैं, लेकिन कुछ श्वास तकनीकें ऐसी होती हैं जो शरीर के अंदर गहराई तक असर करती हैं। उज्जायी प्राणायाम उन्हीं में से एक है। इसे करते समय गले से निकलने वाली हल्की समुद्र जैसी आवाज इसकी पहचान है। यही […]

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नई दिल्ली, 1 जनवरी (khabarwala24)। अक्सर हम योग और प्राणायाम को सिर्फ शारीरिक व्यायाम समझ लेते हैं, लेकिन कुछ श्वास तकनीकें ऐसी होती हैं जो शरीर के अंदर गहराई तक असर करती हैं। उज्जायी प्राणायाम उन्हीं में से एक है। इसे करते समय गले से निकलने वाली हल्की समुद्र जैसी आवाज इसकी पहचान है। यही वजह है कि इसे ओशन ब्रीथ भी कहा जाता है।

आयुर्वेद की दृष्टि से उज्जायी केवल सांस लेने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि कफ और वात को संतुलित करने और पाचन अग्नि को जाग्रत करने वाला प्रभावशाली प्राणायाम माना गया है।

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आयुर्वेद में स्वास्थ्य की जड़ पाचन को माना गया है। अगर जठराग्नि ठीक है, तो शरीर खुद ही कई रोगों से बचा रहता है। उज्जायी प्राणायाम श्वास को धीमा, गहरा और नियंत्रित बनाता है, जिससे शरीर के अंदर हल्की गर्मी उत्पन्न होती है। यही आंतरिक गर्मी पाचन अग्नि को सक्रिय करती है। जिन लोगों को बार-बार अपच, गैस, भारीपन या भूख कम लगने की समस्या रहती है, उनके लिए उज्जायी प्राणायाम सहायक माना जाता है।

कफ और वात दोष आज की जीवनशैली में सबसे ज्यादा बिगड़ते हैं। कफ बढ़ने पर आलस्य, जकड़न, बलगम और सर्दी-जुकाम जैसी समस्याएं आती हैं, जबकि वात बिगड़ने पर गैस, बेचैनी, अनिद्रा और घबराहट बढ़ जाती है। उज्जायी प्राणायाम श्वास-प्रश्वास को लय में लाकर इन दोनों दोषों को संतुलित करने में मदद करता है। गले और छाती के क्षेत्र में होने वाला हल्का घर्षण कफ को ढीला करता है और वात को स्थिर करता है।

इस प्राणायाम का असर सिर्फ शरीर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मन पर भी गहरा प्रभाव डालता है। उज्जायी करते समय ध्यान अपने आप सांस की आवाज पर टिक जाता है। इससे मन भटकता नहीं और तनाव धीरे-धीरे कम होने लगता है। जो लोग जल्दी घबरा जाते हैं, बेचैन रहते हैं या नींद की समस्या से जूझते हैं, उनके लिए यह प्राणायाम बेहद उपयोगी माना जाता है। यह तंत्रिका तंत्र को शांत करता है और शरीर को विश्राम की अवस्था में ले जाता है।

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उज्जायी का एक महत्वपूर्ण लाभ गले और थायराइड क्षेत्र पर भी माना जाता है। गले से होकर नियंत्रित सांस का आना-जाना इस हिस्से को सक्रिय रखता है। आयुर्वेद और योग में इसे विशुद्धि चक्र से जोड़ा गया है, जो अभिव्यक्ति, संतुलन और शुद्धता का केंद्र माना जाता है। नियमित अभ्यास से आवाज में स्पष्टता और आत्मविश्वास में भी सुधार देखा जाता है।

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