मुंह के बैक्टीरिया से मल्टीपल स्क्लेरोसिस की समस्या और बढ़ सकती है: स्टडी

नई दिल्ली, 30 दिसंबर (khabarwala24)। मसूड़ों की गंभीर बीमारी (पेरियोडोंटाइटिस) का असर मल्टीपल स्क्लेरोसिस (एमएस) से पीड़ित लोगों पर ज्यादा पड़ता है। एमएस, सेंट्रल नर्वस सिस्टम की एक पुरानी ऑटोइम्यून बीमारी है।पिछले अध्ययनों से पता चला है कि पेरियोडोंटाइटिस, पुरानी सूजन के जरिए सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर असर डाल सकता है। हालांकि, मल्टीपल स्क्लेरोसिस में […]

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नई दिल्ली, 30 दिसंबर (khabarwala24)। मसूड़ों की गंभीर बीमारी (पेरियोडोंटाइटिस) का असर मल्टीपल स्क्लेरोसिस (एमएस) से पीड़ित लोगों पर ज्यादा पड़ता है। एमएस, सेंट्रल नर्वस सिस्टम की एक पुरानी ऑटोइम्यून बीमारी है।

पिछले अध्ययनों से पता चला है कि पेरियोडोंटाइटिस, पुरानी सूजन के जरिए सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर असर डाल सकता है। हालांकि, मल्टीपल स्क्लेरोसिस में इसकी भूमिका स्पष्ट नहीं है।

साइंटिफिक रिपोर्ट्स जर्नल में छपी नई रिसर्च में पाया गया कि मुंह में पाए जाने वाले बैक्टीरिया फ्यूसोबैक्टीरियम न्यूक्लियेटम का बढ़ा स्तर मल्टीपल स्क्लेरोसिस पीड़ितों में विकलांगता को लगभग दस गुना बढ़ा सकता है। एमएस में लोगों को चलने-फिरने में दिक्कत आ सकती है और दृष्टिबाधिता की शिकायत भी हो सकती है।

हिरोशिमा यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में एसोसिएट प्रोफेसर और लेक्चरर मासाहिरो नाकामोरी ने कहा, “मल्टीपल स्क्लेरोसिस में गट माइक्रोबायोम की बड़े पैमाने पर जांच की गई है, लेकिन ओरल माइक्रोबायोम की भूमिका को ज्यादातर नजरअंदाज किया गया है। ओरल कैविटी पुरानी सूजन का एक बड़ा सोर्स है, इसलिए मल्टीपल स्क्लेरोसिस के गंभीर प्रभाव और बचाव के नए तरीके इजाद करने के लिए इनके बीच के संबंधों को समझने की जरूरत है।”

टीम ने देखा कि फ्यूसोबैक्टीरियम न्यूक्लियेटम की ज्यादा मात्रा वाले मल्टीपल स्क्लेरोसिस के लगभग दो-तिहाई (61.5 प्रतिशत) मरीजों का रोग मध्यम से गंभीर श्रेणी में पहुंच गया।

न्यूरोमाइलाइटिस ऑप्टिका स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर या माइलिन ऑलिगोडेंड्रोसाइट ग्लाइकोप्रोटीन एंटीबॉडी से जुड़ी बीमारी वाले मरीजों में ऐसा कोई संबंध नहीं देखा गया। फ्यूसोबैक्टीरियम न्यूक्लियेटम और कम से कम एक दूसरे पेरियोडोंटल पैथोजन वाले एमएस मरीजों की स्थिति और बिगड़ी हुई पाई गई।

मुंह के बैक्टीरिया मल्टीपल स्क्लेरोसिस के मरीजों के हालात और बिगाड़ सकते हैं। रिसर्च में पाया गया कि एमएस मरीजों में इस बैक्टीरिया की अधिक मात्रा होने पर विकलांगता स्कोर (ईडीएसएस) ऊंचा होता है, जो सूजन और न्यूरोडीजेनेरेशन को बढ़ावा दे सकता है। यह बैक्टीरिया पीरियोडॉन्टाइटिस (मसूड़ों की बीमारी) से जुड़ा है और एमएस के लक्षणों को बिगाड़ सकता है।

हालांकि, कुछ अध्ययन इस लिंक को पूरी तरह पुष्ट नहीं करते और कहते हैं कि कोई सीधा संबंध नहीं मिला। एमएस एक ऑटोइम्यून बीमारी है जो तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है, और ओरल हेल्थ का इससे कनेक्शन नई रिसर्च का विषय है।

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