नई दिल्ली, 23 जनवरी (khabarwala24)। जब भी शरीर बीमार होता है, तो तुरंत बीमारी का कारण जाने बिना दवा लेकर खुद को रिकवर कर लिया जाता है। दवा थोड़े समय तक आराम देती है और फिर कुछ समय बाद बीमारी दोबारा शरीर को घेर लेती है।
आयुर्वेद का मानना है कि सिर्फ बीमारी को नहीं, बल्कि बीमारी की जड़ को खत्म करना जरूरी है। अगर बीमारी की जड़ पता चल जाए तो बीमारी खुद-ब-खुद खत्म हो जाती है।
आयुर्वेद का मानना है कि शरीर बाहर के वातावरण से बीमार जरूर होता है, लेकिन बीमारी की असली जड़ हमारे अंदर ही छिपी है। आयुर्वेद में रोग की जड़ को जानने के लिए तीन भागों में विभाजित किया गया है, जिससे कुछ आदतों को पहचान कर और उनमें सुधार लाकर रोगों से मुक्ति पाई जा सकती है।
रोग की पहली जड़ है प्रज्ञापराध, यानी जानबूझकर ऐसी चीजें करना जिससे शरीर के बीमार होने की संभावना बढ़ जाती है। इसमें जानते हुए भी गलत खाना, भूख न लगने पर भी खाना, थकान होने पर भी आराम न करना, रोजाना गुस्सा और चिंता करना और नींद को गंभीरता से न लेना शामिल है। ये सभी कारण हैं जो किसी भी स्वस्थ शरीर को बीमार करने के लिए काफी हैं और यही रोग की पहली जड़ भी है।
दूसरी जड़ है अग्नि का नाश। शरीर की पाचन अग्नि सिर्फ खाना पचाने में ही सहायक नहीं है, बल्कि ये शरीर का ऊर्जा का केंद्र है, पूरे शरीर का ओज है। प्रज्ञापराध में की गई चीजों का सीधा असर पाचन अग्नि पर पड़ता है और खाना पचने की बजाय शरीर में सड़ने लगता है। ऐसे में कितना भी प्रोटीन या विटामिन से भरा खाना शरीर को आधा-अधूरा पोषण ही दे पाता है और शरीर में धीरे-धीरे आम जमा होने लगती है।
तीसरी जड़ है दोषों का विकार। हमारे शरीर को संतुलित करने के लिए शरीर के अंदर तीन दोष यानी वात, कफ और पित्त दोष होते हैं। अगर ये तीनों दोष संतुलित हैं तो शरीर रोगों से कोसों दूर रहता है, लेकिन अग्नि के नाश और आम के जमाव से तीनों दोष ही असंतुलित हो जाते हैं और शरीर रोगों से घिर जाता है। इससे पेट से जुड़े रोग, सांस से जुड़े रोग, और हड्डियों और मांसपेशियों से जुड़े रोग परेशान करने लगते हैं और हम उन्हें सामान्य मानकर दवा लेकर ठीक हो जाते हैं। दवा का सेवन करना सही है, लेकिन इसके साथ ही बीमारी की जड़ को पहचान पाना भी जरूरी है, जिससे बीमारी को जड़ से खत्म किया जा सके।
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