नई दिल्ली, 29 नवंबर (khabarwala24)। सुधा मल्होत्रा, नाम ही जैसे संगीत के आकाश में एक चमकता सितारा हो, उनकी आवाज में एक ऐसी मिठास थी जो सीधे दिल को छू जाती थी, जैसे किसी ने मोहब्बत की आंखों से अश्क चुराए हों और उन्हें फलक पर सितारों में सजाया हो। सुधा के सुर में इतनी मिठास और गहराई थी कि उनकी हर धुन दिल में बस जाती थी। महज 13 साल की उम्र में नन्ही सी सुधा ने पहली बार अपने गीतों से लोगों का मन मोह लिया। इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक, सैकड़ों हिट गाने गाए।
सुधा का जन्म 30 नवंबर 1936 को दिल्ली में हुआ, लेकिन बचपन का ज्यादातर समय लाहौर में बीता। उनके माता-पिता दोनों संगीत प्रेमी थे, इसलिए छोटी उम्र से ही सुधा की रुचि को देखकर पिता ने उन्हें लाहौर के देशबंधु सेठी से शास्त्रीय संगीत सिखाया। स्कूल और आस-पड़ोस के छोटे-छोटे कार्यक्रमों में सुधा गाया करती थीं। एक बार रेड क्रॉस चैरिटी के कार्यक्रम में मास्टर गुलाम हैदर ने सुधा की आवाज सुनी और चकित रह गए। उन्होंने तुरंत कहा, ‘बड़ी होकर ये लड़की बहुत बड़ी गायिका बनेगी।’
लाहौर में ही सुधा की शोहरत फैल गई और बाल कलाकार के रूप में उन्होंने आकाशवाणी लाहौर में गाने शुरू कर दिए, लेकिन विभाजन के बाद पूरा परिवार दिल्ली आ गया। दिल्ली में पंडित अमरनाथ से संगीत की शिक्षा जारी रही। फिर किस्मत ने उन्हें भोपाल भेज दिया, जहां उनके पिता स्कूल में प्रिंसिपल बने। सुधा अपने भाइयों के साथ स्कूल में पढ़ती और संगीत का रियाज करती रही।
मुंबई उनका ननिहाल था और गर्मियों में जब भी वह मामा के घर जाती, संगीत का माहौल उन्हें और भी प्रभावित करता। इसी दौरान उन्होंने प्रसिद्ध संगीतकार अनिल विश्वास से मुलाकात की। सुधा की आवाज सुनकर अनिल विश्वास इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें 1950 में फिल्म ‘आरजू’ में एक गीत गाने का मौका दिया। सिर्फ 13 साल की उम्र में सुधा ने ‘मिल गए नैन’ गाकर रातों-रात लोकप्रियता पा ली।
उस गीत की सफलता के बाद सुधा के पास हिंदी फिल्मों के कई ऑफर्स आने लगे। वे भोपाल से मुंबई आती और रिकॉर्डिंग करके वापस चली जाती। जल्द ही इतना काम बढ़ गया कि उन्हें मामा के घर मुंबई शिफ्ट होना पड़ा। वहीं उन्होंने पटियाला घराने के उस्ताद अब्दुल रहमान खान और पंडित लक्ष्मण प्रसाद जयपुरी से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा भी जारी रखी।
फिल्म ‘आरजू’ उनकी डेब्यू फिल्म मानी जाती है। इसके बाद सुधा ने लगभग 10 सालों में 145 फिल्मों में 250 से अधिक गीत गाए। उनके गीतों में हर भावना का रंग था, कभी मोहब्बत का हुस्न, तो कभी दर्द की तीव्रता। ‘मोहब्बत में ऐसे जमाने भी आए’, ‘दिल ए नादान’, ‘रंगीन रातें’, ‘चमक चांदनी’, ‘चलती का नाम गाड़ी’ और ‘परवरिश’ जैसे गाने आज भी लोगों के दिल में बसे हैं।
23 साल की उम्र में उन्होंने आखिरी बार फिल्म ‘दीदी’ का गीत ‘तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक है तुमको’ गाया। उस समय साहिर लुधियानवी और एन दत्ता के साथ काम करने के अनुभव ने उन्हें और भी मशहूर बना दिया। इस बीच शिकागो के रेडियो मालिक मोटवानी परिवार के बेटे गिरधर मोटवानी से सुधा की शादी हो गई। उस समय के समाज में फिल्मों में काम करना बहुओं के लिए अच्छा नहीं माना जाता था, इसलिए सुधा ने फिल्म संगीत से दूरी बना ली।
हालांकि, शादी के बाद राजकपूर के कहने पर उन्होंने ‘प्रेम रोग’ फिल्म के लिए एक गीत ‘ये प्यार था या कुछ और था’ गाया। फिर भी उनके पहले रिकॉर्ड किए गए गीत 1960 के दशक में रिलीज होते रहे और सुपरहिट साबित हुए।
Source : IANS
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