नई दिल्ली, 30 जनवरी (khabarwala24) दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि दिल्ली महिला आयोग (डीसीडब्ल्यू) लंबे समय से निष्क्रिय बना हुआ है। इसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय राजधानी में महिलाओं के संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों का निरंतर उल्लंघन हो रहा है।
याचिका में डीसीडब्ल्यू के भौतिक और प्रशासनिक कामकाज को बहाल करने के लिए तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की गई है, जो कथित तौर पर कार्यपालिका की निष्क्रियता और नेतृत्व के अभाव के कारण संचालन रूप से निष्क्रिय हो गया है।
पीआईएल में कहा गया है कि महिलाओं को हिंसा, दुर्व्यवहार, शोषण और भेदभाव से बचाना डीसीडब्ल्यू का वैधानिक दायित्व है। बावजूद इसके नियमित कार्य दिवस के दौरान आयोग का कार्यालय बंद और खाली रहता है, और शिकायतों को प्राप्त करने के लिए कोई हेल्पडेस्क, अधिकारी या कर्मचारी उपलब्ध नहीं रहते।
अधिवक्ता सत्यम सिंह राजपूत द्वारा दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि महिला एवं बाल विकास आयोग (डीसीडब्ल्यू) के अध्यक्ष का पद रिक्त बना हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप नेतृत्व, प्रशासनिक दिशा-निर्देश और जवाबदेही का पूर्ण अभाव है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, इस संस्थागत गतिरोध के कारण सहयोगिनी परिवार परामर्श इकाई, हेल्पडेस्क, रेप क्राईसिस सेल और क्राइसिस इंटरवेंशन सेंटर सहित वैधानिक कार्यक्रमों की व्यापक विफलता हुई है, जिससे महिलाओं को तत्काल संस्थागत सहायता से वंचित होना पड़ रहा है।
याचिका में कहा गया कि आयोग के निष्क्रिय होने से राज्य महिलाओं के प्रति अपने सकारात्मक दायित्वों को निभाने में गंभीर संवैधानिक विफलता का सामना कर रहा है। कहा गया कि महिला-केंद्रित वैधानिक संस्थानों को निष्क्रिय नहीं रहने दिया जा सकता है।
जनहित याचिका में आगे कहा गया है कि दिल्ली के मुख्य सचिव और उपराज्यपाल को विस्तृत अभ्यावेदन प्रस्तुत किए गए थे, जिनमें डीसीडब्ल्यू के लगातार निष्क्रिय रहने और इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले गंभीर संवैधानिक परिणामों को उजागर किया गया था।
हालांकि, उठाए गए मुद्दों की गंभीरता के बावजूद, कोई प्रभावी सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, जिसके कारण याचिकाकर्ता को दिल्ली हाईकोर्ट का रुख करना पड़ा।
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