मुक्ति-गुप्तेश्वर महादेव : ऑस्ट्रेलिया में मौजूद 13वां ज्योतिर्लिंग, मंदिर की शैली भी अद्भुत

नई दिल्ली, 21 दिसंबर (khabarwala24)। देश के कई हिस्सों में भगवान शिव के पवित्र स्थान 12 ज्योतिर्लिंग के रूप में विद्यमान हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव को समर्पित 13वां ज्योतिर्लिंग भी मौजूद है?अभी तक हमारे देश में 12 ज्योतिर्लिंग की पवित्र यात्रा की जाती है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया में भगवान शिव को […]

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नई दिल्ली, 21 दिसंबर (khabarwala24)। देश के कई हिस्सों में भगवान शिव के पवित्र स्थान 12 ज्योतिर्लिंग के रूप में विद्यमान हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव को समर्पित 13वां ज्योतिर्लिंग भी मौजूद है?

अभी तक हमारे देश में 12 ज्योतिर्लिंग की पवित्र यात्रा की जाती है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया में भगवान शिव को समर्पित 13वां ज्योतिर्लिंग स्थापित है, जिसे तकरीबन 26 साल पुराना बताया गया है।

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ऑस्ट्रेलिया के सिडनी के पास मिंटो में 13वें ज्योतिर्लिंग के रूप में मुक्ति-गुप्तेश्वर महादेव मंदिर स्थापित है। मंदिर में भगवान शिव को समर्पित 12 ज्योतिर्लिंगों की प्रतिकृतियां को भी दर्शाया गया है और भक्त मंदिर की भव्यता और आस्था से मंदिर की ओर खींचे चले आते हैं।

इस मंदिर को वहां के लोग भगवान शिव का 13वां ज्योतिर्लिंग मानते हैं। मंदिर में बनाए गए शिवलिंग भगवान शिव के 108 रुद्र नामों और 1008 सहस्त्र नामों को दर्शाते हैं। हर मूर्ति भगवान शिव के एक छोटे मंदिर को दर्शाती है और इसलिए मुक्ति-गुप्तेश्वर मंदिर के अंदर कुल 1,128 छोटे मंदिर हैं, जो अपनी तरह का बहुत अनोखा मंदिर है। हर सुबह पुजारी 13वें ज्योतिर्लिंग, दूसरे 12 ज्योतिर्लिंगों की 12 प्रतिकृतियों, 108 रुद्र शिवों और 1008 सहस्त्र नाम भगवान शिव की पूजा करते हैं।

मंदिर के गर्भगृह में एक छिपा गहरा कुंड है। इस कुंड में भक्तों के हाथ से लिखे 20 लाख नोट हैं, जिन पर ‘ओम नमः शिवाय’ मंत्र लिखा है। माना जाता है कि कुंड में ऑस्ट्रेलिया की 81 पवित्र नदियों का जल और पांच महासागरों का पानी भी है, जिसमें आठ कीमती धातुएं मिली हैं। इसके अलावा, मंदिर के पास भगवान गणेश का मंदिर भी मौजूद है, जिसका निर्माण कार्य 1997 में शुरू हुआ था, जबकि शिव मंदिर में विराजमान भगवान शिव की प्राण प्रतिष्ठा साल 1999 के समय हुई थी।

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मुक्ति-गुप्तेश्वर महादेव मंदिर की नींव साल 1997 में रखी गई थी, जब ऑस्ट्रेलिया में हिंदू देवी-देवताओं के प्रति बढ़ती भक्ति देखी गई थी। उस वक्त नेपाल के तत्कालीन राजा बीरेंद्र बीर बिक्रम शाह ने भगवान शिव की प्रतिमा भेंट स्वरूप दी थी, जिसके 2 साल बाद 1999 में मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हुआ और महाशिवरात्रि के दिन प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा की गई।

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