बुलंदशहर रोड स्थित श्री मां मनसा देवी मंदिर में चल रहे सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन आचार्य राजीव कृष्ण भारद्वाज ने ध्रुव चरित्र, सती चरित्र, नृसिंह अवतार और जड़ भरत की कथाओं के जरिए भक्ति की महिमा बताई। कथा में अडिग श्रद्धा और विश्वास से परमात्मा का साक्षात्कार संभव होने का संदेश दिया गया। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ से पंडाल छोटा पड़ गया, और लोग भजनों में डूबकर जयकारे लगाते रहे। मुख्य यजमानों ने आरती की, और चौथे दिन बालि वामन चरित्र व श्री रामावतार की कथा होगी।
कथा की शुरुआत और श्रद्धालुओं का उत्साह
कथा की शुरुआत भगवान के मधुर भजनों और व्यास पूजन से हुई। बुलंदशहर में श्री मां मनसा देवी मंदिर परिसर में 16वें वार्षिक उत्सव के मौके पर यह आयोजन हो रहा है। इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आए कि पंडाल में जगह कम पड़ गई। हर कोई भक्ति रस में गोते लगाता नजर आया। जयकारों से पूरा माहौल गूंज उठा। आचार्य राजीव कृष्ण भारद्वाज ने भक्ति की शक्ति पर जोर देते हुए कहा कि सच्ची श्रद्धा से कुछ भी असंभव नहीं।
सती चरित्र: अहंकार का त्याग जरूरी
कथा में सबसे पहले माता सती के प्रसंग को सुनाया गया। कथावाचक ने बताया कि बिना बुलाए किसी जगह जाना, चाहे पिता का घर ही क्यों न हो, मान-सम्मान की हानि कर सकता है। दक्ष प्रजापति के अहंकार की वजह से सती को योगाग्नि में अपना शरीर त्यागना पड़ा। इससे सीख मिलती है कि भक्ति में अहंकार का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। श्रद्धालुओं ने इस कथा से भक्ति के सच्चे रूप को समझा।
ध्रुव चरित्र: बालक की तपस्या से परमात्मा साक्षात्कार
तीसरे दिन की मुख्य कथा ध्रुव चरित्र पर केंद्रित रही। मात्र पांच साल के बालक ध्रुव ने वन में जाकर कठोर तपस्या की। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और गुरु के प्रति निष्ठा का वर्णन सुनकर पंडाल में हर किसी की आंखें नम हो गईं। आचार्य ने कहा कि अगर ध्रुव जैसी श्रद्धा हो, तो परमात्मा को प्राप्त करना मुश्किल नहीं। ध्रुव की तपस्या से खुश होकर भगवान प्रकट हुए, तो श्रद्धालुओं ने ‘जय श्री कृष्ण’ के जयकारों से आसमान गुंजा दिया। यह कथा भक्ति की ताकत का जीवंत उदाहरण बनी।
नृसिंह अवतार: प्रह्लाद की रक्षा का चमत्कार
कथा के अगले हिस्से में भगवान नृसिंह अवतार की कहानी सुनाई गई। हिरण्यकशिपु के वध और प्रह्लाद की अटूट भक्ति के प्रसंग ने सभी को प्रभावित किया। भगवान ने प्रह्लाद की रक्षा के लिए नृसिंह रूप धारण किया। इस दौरान मंदिर में नृसिंह की भव्य झांकी निकाली गई, जिसके दर्शन से श्रद्धालु खुशी से झूम उठे। यह कथा बताती है कि सच्चा भक्त कभी अकेला नहीं होता, भगवान हमेशा उसकी मदद करते हैं।
जड़ भरत प्रसंग: मोह-माया से दूर रहने की सीख
आचार्य ने जड़ भरत की कथा के जरिए समझाया कि मोह-माया इंसान को बार-बार जन्म-मरण के चक्र में फंसाती है। इसलिए हमेशा जागरूक रहकर प्रभु का स्मरण करना चाहिए। इस कथा से श्रद्धालुओं को जीवन की सच्चाई समझ आई कि सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर ही सच्ची मुक्ति मिलती है।
कथा का समापन और आने वाला कार्यक्रम
कथा के अंत में मुख्य यजमान शिवकुमार मित्तल, रितु मित्तल, मधुसूदन गोयल और अंशिका गोयल ने भागवत आरती की। मीडिया प्रभारी महेश तोमर ने बताया कि चौथे दिन की कथा में बालि वामन चरित्र, श्री रामावतार और कृष्ण जन्म की कथा सुनाई जाएगी। इस मौके पर प्रबंधक शिवकुमार मित्तल, महेश तोमर, बिजेंद्र कंसल, अनुज मित्तल समेत कई सदस्य उपस्थित रहे। आयोजन समिति के सभी लोगों ने मिलकर इस कार्यक्रम को सफल बनाया।
यह श्रीमद्भागवत कथा न सिर्फ धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि जीवन की सीख भी देती है। बुलंदशहर में ऐसे आयोजन से स्थानीय श्रद्धालु भक्ति में डूबते हैं।
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