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खो-खो: महाभारत काल से जुड़ा खेल, जिसमें फुर्ती, रणनीति और टीमवर्क का मिश्रण

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नई दिल्ली, 11 जनवरी (khabarwala24)। भारत के पारंपरिक खेल ‘खो-खो’ में फुर्ती, रणनीति और टीमवर्क की अहम भूमिका होती है। सीमित मैदान पर खेला जाने वाला फिटनेस और अनुशासन का यह खेल खिलाड़ियों की गति, संतुलन और निर्णय क्षमता को निखारता है।

माना जाता है कि खो-खो की जड़ें महाराष्ट्र से जुड़ी हैं, लेकिन महाभारत काल में भी इसका जिक्र है, जहां रथों पर खेले जाने वाले ‘राठेरा’ जैसा खेल इसका आधार बना। साल 1914 में पुणे के डेक्कन जिमखाना क्लब ने खो-खो के आधुनिक रूप को डिजाइन किया। इस दौरान खेल के लिए नियम भी बनाए गए।

1936 बर्लिन ओलंपिक में खो-खो को प्रदर्शनी खेल के तौर पर शामिल किया गया। हालांकि, यह आधिकारिक प्रतिस्पर्धी खेल नहीं था। 1955 में खो खो फेडरेशन ऑफ इंडिया (केकेएफआई) की स्थापना की गई। 1959-60 में पहली बार पहली ऑल इंडिया खो-खो चैंपियनशिप का आयोजन किया गया। विमेंस नेशनल चैंपियनशिप 1960-61 में आयोजित हुई।

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इस खेल को एशियन गेम्स 1982 में शामिल किया गया था। खो-खो को गुवाहाटी में हुए साउथ एशियन गेम्स 2016 में मेडल वाले खेल के तौर पर शामिल किया गया था। फिलहाल करीब 25 देशों की अपनी खो-खो टीमें हैं।

आयताकार मैदान (27 मीटर x 16 मीटर) पर खेले जाने वाले इस खेल में दोनों छोर पर लकड़ी के खंभे होते हैं। प्रत्येक टीम में 12 खिलाड़ी होते हैं, लेकिन एक बार में सिर्फ 9 खिलाड़ी ही खेल सकते हैं। 27 मीटर की दो रेखाओं को साइड लाइन्स कहा जाता है, जबकि 16 मीटर की दो रेखाओं को ड्यू रेखा एंड लाइन्स कहा जाता है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर के खो-खो मुकाबले दो पारियों में बंटे होते हैं। प्रत्येक पारी में 9 मिनट के 2 टर्न होते हैं। इसमें एक टीम पीछा करती है, तो दूसरी टीम बचाव करती है। पीछा करने वालों का मकसद बचाव करने वालों को हथेली से छूकर टैग करना होता है, जबकि बचाव करने वाले टैग होने से बचने और समय खत्म होने तक भागने की कोशिश करते हैं।

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टॉस जीतने वाला कप्तान चेज या डिफेंस में से एक चुनता है। चेज करने वाली टीम के 8 खिलाड़ी बैठ जाते हैं। लगातार चेज करने वाले एक दिशा में नहीं जा सकते, उन्हें साइड लाइन्स के उलट पोजीशन लेनी होती है। नौवां चेजर मुकाबले का आगाज फ्री जोन से करता है।

दोनों पारियों के अंत में सर्वाधिक अंक हासिल करने वाली टीम को विजेता घोषित किया जाता है। अगर दोनों टीमों के अंक बराबर हों, तो एक अतिरिक्त पारी के साथ विजेता का फैसला किया जाता है। अगर इसके बावजूद कोई विजेता निर्धारित न हो, तो दोनों टीमें एक-एक टर्न लेती हैं और सबसे कम समय में अंक जीतने वाली टीम विजेता कहलाती है।

भारत में बड़े फैन बेस और समर्पित फॉलोअर्स के साथ, खो-खो में अलग-अलग लेवल पर कई टूर्नामेंट्स और इवेंट्स आयोजित किए जाते हैं। ये डिस्ट्रिक्ट से लेकर नेशनल लेवल तक होते हैं।

पेशेवर लीग अल्टीमेट खो खो (यूकेके) इस खेल में नए युग की शुरुआत का प्रतीक है, जिसकी शुरुआत केकेएफआई के सहयोग से हुई। इस लीग का मकसद खो-खो को आधुनिक प्रतिस्पर्धी रूप में प्रस्तुत करते हुए इसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाना है।

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