नई दिल्ली, 6 अक्टूबर (khabarwala24)। दिसंबर 2002, दक्षिण कोरिया के बुसान शहर में एशियन गेम्स का मैदान। हवा में धूल, जोरदार शोर और लाखों उम्मीदों का वजन। दर्शक दीर्घा से एक लंबी सांस हवा में गुम हो जाती है, जब भारत का एक घुड़सवार अपने घोड़े के साथ अंतिम बाधा (शो जम्पिंग) को पार करने के लिए तैयार होता है। उनकी उम्र 53 की थी। एक ऐसी उम्र जब ज्यादातर एथलीट अपने जूते टांग चुके होते हैं। लेकिन इस खिलाड़ी के लिए, उम्र महज एक संख्या थी। यह कहानी है भारतीय घुड़सवारी के उस अदम्य सारथी की, जिसने अपने जीवन के पांचवें दशक में भी देश के लिए पदक जीता।
उन्होंने साबित किया कि जुनून और लगन आपको दुनिया के सबसे बड़े खेल के मंच तक ले जा सकते हैं। यह कहानी है 1949 में जन्मे इंद्रजीत लांबा की।
इंद्रजीत लांबा का जन्म 7 अक्टूबर 1949 को हुआ था, एक ऐसे समय में जब भारत में घुड़सवारी अभी भी मुख्य रूप से सेना और अभिजात वर्ग का खेल मानी जाती थी, लेकिन लांबा के लिए घोड़ा कभी भी सिर्फ एक जानवर या खेल का उपकरण नहीं था। वह एक साथी, एक शिक्षक और एक गूढ़ भाषा का वाहक था।
माना जाता है कि उनका प्रारंभिक जीवन सेना या पुलिस प्रशिक्षण अकादमियों के आसपास बीता, जहां घोड़ों के साथ अनुशासन और सम्मान का रिश्ता बचपन से ही शुरू हो जाता है। घुड़सवारी की तीन मुख्य विधाएं (ड्रेसेज (तालमेल और अनुशासन), क्रॉस-कंट्री (साहस और सहनशक्ति) और शो जंपिंग (शुद्धता और गति)) हर विधा में महारत हासिल करना एक तपस्या है और लांबा ने इस तपस्या को सालों तक जिया।
उन्होंने घुड़सवारी के खेल को तब चुना जब इसमें आधुनिक सुविधाएं और अंतरराष्ट्रीय स्तर का समर्थन नाम मात्र का था। यह एक ऐसा रास्ता था जहां हारने पर सांत्वना नहीं मिलती थी और जीतने पर भी क्रिकेटरों जैसी शोहरत नहीं। यह रास्ता सिर्फ आत्मा की संतुष्टि और देश के लिए कुछ कर गुजरने के ‘जज्बे’ के लिए चुना जाता था। उनकी जवानी के वर्षों में, उन्होंने अनगिनत स्थानीय और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लिया, धीरे-धीरे उस कौशल को तराशा जो बाद में उन्हें अटलांटा और बुसान तक ले गया। लांबा जानते थे कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए, उन्हें अपने घोड़ों के साथ मनुष्य-और-पशु का नहीं, बल्कि ‘दो आत्माओं’ का रिश्ता बनाना होगा।
1990 का दशक भारतीय घुड़सवारी के लिए एक बड़ा मोड़ था और इस मोड़ पर भारत की उम्मीद बनकर खड़े थे इंद्रजीत लांबा। उनकी वर्षों की तपस्या रंग लाई और उन्हें 1996 के अटलांटा समर ओलिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने का गौरव प्राप्त हुआ। यह व्यक्तिगत इवेंटिंग स्पर्धा थी। शायद घुड़सवारी की सबसे कठिन विधा।
ओलिंपिक में उनका साथी था, उनका वफादार घोड़ा ‘करिश्मा’। नाम के अनुरूप ही, यहजोड़ी ओलंपिक के मैदान पर किसी करिश्मे से कम नहीं थी। ओलंपिक में क्वालीफाई करना ही अपने आप में एक बहुत बड़ी जीत थी। उन्होंने भारत को विश्व मंच पटल पर रखा। उस समय वह इम्तिया अनीस (2000 सिडनी ओलंपिक) और बाद में फौआद मिर्जा (2020 टोक्यो ओलंपिक) जैसे एथलीटों से पहले, आधुनिक भारतीय घुड़सवारी के अग्रदूतों में से एक बने।
ओलंपिक का क्रॉस-कंट्री चरण, जहां घोड़े और सवार को जंगल और पानी के बीच बनी भयंकर बाधाओं को तेज गति से पार करना होता है, दुनिया के सबसे खतरनाक खेल इवेंट्स में गिना जाता है। लांबा और करिश्मा ने बहादुरी से मुकाबला किया, लेकिन शीर्ष 25 घुड़सवारों के बीच प्रतिस्पर्धा इतनी तीव्र थी कि वे अंततः पदक की दौड़ से बाहर हो गए।
उन्होंने अपनी ट्रेनिंग को और कठोर बना दिया। लेकिन यहां एक और बाधा थी-बढ़ती उम्र। घुड़सवारी एक शारीरिक रूप से थका देने वाला खेल है, जिसके लिए प्रतिक्रिया, मजबूत कोर और अथाह सहनशक्ति की जरूरत होती है। 40 की उम्र पार करने के बाद भी, लांबा अपने शरीर को उसी स्तर पर बनाए रखने की चुनौती ले रहे थे। और फिर, क्लाइमेक्स आया 2002 के एशियाई खेलों में। 53 वर्ष की आयु में, इंद्रजीत लांबा अपनी अंतिम बड़ी अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग ले रहे थे। वह भारतीय घुड़सवारी टीम का हिस्सा थे, जिसने इवेंटिंग (थ्री-डे इवेंट) में हिस्सा लिया।
फाइनल राउंड में, तनाव चरम पर था। छोटी-सी गलती भी कई सालों की मेहनत को बर्बाद कर सकती थी। लांबा ने अपने अनुभव और शांत स्वभाव का परिचय दिया। उनका हर जंप, हर ड्रेसेज मूवमेंट और क्रॉस-कंट्री का हर मोड़ एक अनुभवी खिलाड़ी की शुद्धता को दर्शाता था।
जब परिणाम घोषित हुए, तो वह पल भारतीय घुड़सवारी के इतिहास में दर्ज हो गया।
Source : IANS
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