श्री श्रृंगरा वल्लभ स्वामी मंदिर: ये है दक्षिण भारत का पहला तिरुपति मंदिर! खुद देवताओं ने रखी थी मंदिर की नींव

नई दिल्ली, 13 दिसंबर (khabarwala24)। दक्षिण भारत में तिरुपति बालाजी मंदिर की महिमा बहुत ज्यादा है, हर भक्त अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए इस मंदिर की चौखट पर जरूर आता, लेकिन क्या आप जानते हैं कि तिरुपति बालाजी मंदिर से अधिक पुराना मंदिर आंध्र प्रदेश में मौजूद है?इस मंदिर को पहला और असली तिरुपति मंदिर […]

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नई दिल्ली, 13 दिसंबर (khabarwala24)। दक्षिण भारत में तिरुपति बालाजी मंदिर की महिमा बहुत ज्यादा है, हर भक्त अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए इस मंदिर की चौखट पर जरूर आता, लेकिन क्या आप जानते हैं कि तिरुपति बालाजी मंदिर से अधिक पुराना मंदिर आंध्र प्रदेश में मौजूद है?

इस मंदिर को पहला और असली तिरुपति मंदिर माना जाता है। हम बात कर रहे हैं आंध्र प्रदेश के काकीनाडा जिले के पास बने श्री श्रृंगरा वल्लभ स्वामी मंदिर की, जो अपने आप में एक इतिहास को संजोए हुए है।

श्री श्रृंगरा वल्लभ स्वामी मंदिर को ‘थोली तिरुपति’ मंदिर भी कहा जाता है। ‘थोली तिरुपति’ का मतलब है पहला तिरुपति। यह मंदिर इसलिए भी खास है क्योंकि मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर की मुस्कुराती प्रतिमा मौजूद है, जो उम्र में ऊंचाई के साथ अलग-अलग नजर आती है। भगवान वेंकटेश्वर की मुस्कुराती प्रतिमा को लेकर कहा जाता है कि अगर प्रतिमा को बच्चे देखते हैं तो वे उन्हें बाल रूप में नजर आते हैं और जब बड़े भक्त देखते हैं, तो वे बड़े वेंकटेश्वर के रूप में दर्शन देते हैं।

मंदिर में मौजूद भगवान वेंकटेश्वर की प्रतिमा स्वयंभू है। प्रतिमा में शंख-चक्र भी तिरुमला बालाजी से उल्टी दिशा में है। तिरुमला बालाजी में दाईं तरफ सुदर्शन चक्र और बाईं तरफ शंख है, लेकिन श्री श्रृंगरा वल्लभ स्वामी मंदिर में दोनों की उपस्थिति उल्टी है। 9000 साल पुराने मंदिर के निर्माण को लेकर भी कहा जाता है कि मंदिर की नींव खुद देवी-देवताओं ने रखी थी, जिसके बाद धीरे-धीरे मंदिर का निर्माण हुआ। कहा जाता है कि महर्षि नारद ने देवी लक्ष्मी की मूर्ति स्थापित की थी। पहले मंदिर में भगवान वेंकेटश्वर अकेले थे, जिसके बाद नारद महर्षि ने मंदिर को पूर्ण करने के लिए मां लक्ष्मी के रूप में देवी भूदेवी की स्थापना की।

मंदिर में कुछ शिलालेख भी मौजूद हैं, जो मंदिर के इतिहास को दिखाते हैं। शिलालेखों पर पुरानी तमिल भाषा में मंदिर के इतिहास के बारे में लिखा है। खास बात ये है कि मंदिर के प्रांगण में एक कुआं मौजूद है, जिसे चमत्कारी कुआं कहा जाता है। कुएं के पानी में 15 जड़ी-बूटियों का मिश्रण होने का दावा किया जाता है और मंदिर के प्रसाद को बनाने में इसी पानी का प्रयोग सदियों से होता आया है। इस कुएं का पानी स्वाद में मीठा होता है। भक्त शरीर की बीमारियों से निजात पाने के लिए कुएं का पानी अपने साथ भी लेकर जाते हैं।

मंदिर में बड़ा मंडपम भी मौजूद है, जो कि कई स्तंभों के सहारे खड़ा है। स्तंभ पर भगवान विष्णु के अलग-अलग रूपों की प्रतिमा अंकित की गई है।

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