नई दिल्ली, 2 जनवरी (khabarwala24)। पुणे की संकरी गलियों में साल 1848 की एक सुबह एक महिला अपने घर से निकली। उसके हाथ में कुछ किताबें थीं और आंखों में एक अजीब सा आत्मविश्वास। जैसे ही वह सड़क पर आगे बढ़ी, गलियों के कोनों पर खड़े लोग फुसफुसाने लगे। अचानक एक पत्थर उनके कंधे पर आकर लगा।
फिर उनके चेहरे पर कीचड़ उछाला गया और अपशब्दों की बौछार होने लगी, लेकिन वह महिला न रुकी नहीं। उसे पता था कि आज फिर उसे स्कूल पहुंचकर अपनी मैली साड़ी बदलनी होगी। यह महिला कोई और नहीं, सावित्रीबाई फुले थीं।
3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के एक छोटे से गांव नायगांव में जन्मी सावित्रीबाई का बचपन उस दौर में बीता, जहां लड़कियों के लिए ‘अक्षर’ देखना भी पाप माना जाता था। मात्र 9 साल की उम्र में उनका विवाह 13 साल के ज्योतिराव फुले से कर दिया गया।
ज्योतिराव ने सावित्रीबाई के भीतर की उस आग को पहचाना जिसे समाज बुझाना चाहता था। उन्होंने उन्हें घर पर पढ़ाना शुरू किया।
ज्योतिराव स्वयं एक महान शिक्षक, विचारक, कार्यकर्ता, समाज सुधारक, लेखक, दार्शनिक, संपादक और क्रांतिकारी थे।
सावित्रीबाई पढ़ी-लिखी नहीं थीं। ज्योतिराव शिक्षा के माध्यम से समाज में जागृति लाने और नारी शिक्षा के पक्षधर थे, परन्तु समाज के विरोध के कारण प्रयास सफल नहीं हो पा रहा था। यह समस्या उन्होंने अपनी मौसी सगुणाबाई और पत्नी सावित्रीबाई के समक्ष रखी।
सगुणाबाई का कथन था कि हमें शिक्षा की आवश्यकता है और तुम्हारे पास शिक्षा देने की सामर्थ्य है। अगर किसी समाज को बदलना है तो उस समाज की स्त्रियों को शिक्षित करना आवश्यक है।
दोनों महिलाएं तत्काल नारी शिक्षा के लक्ष्य की प्रथम छात्राएं बन गईं। अगले दिन से गांव की अमराई की छांव में अस्पृश्य नारी शिक्षा की पहली पाठशाला प्रारम्भ हुई। यह महाराष्ट्र में दलित नारी शिक्षा का पहला और ऐतिहासिक प्रयास था।
1 जनवरी 1848 को पुणे के भिडे वाडा में जब सावित्रीबाई ने लड़कियों के लिए भारत का पहला स्कूल खोला, तो वह केवल छह छात्राओं के साथ शुरू हुआ था। यह उस दौर के कट्टरपंथी समाज के सीने पर एक मूंग दलने जैसा था। सावित्रीबाई और ज्योतिराव का मानना था कि शिक्षा केवल डिग्री लेना नहीं, बल्कि ‘बौद्धिक मुक्ति’ है।
वे जानती थीं कि अगर एक दलित या पिछड़े वर्ग की महिला शिक्षित हो गई, तो वह सदियों पुरानी गुलामी की बेड़ियों को काट देगी। उनके स्कूल में गणित और विज्ञान के साथ-साथ तर्कशक्ति पर जोर दिया जाता था।
सावित्रीबाई एक क्रांतिकारी कवयित्री भी थीं। उनकी रचना ‘काव्य फुले’ में वे लिखती हैं, “जाओ, शिक्षा प्राप्त करो, स्वावलंबी बनो।” उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा को ‘अंग्रेजी माता’ कहा। उनका तर्क था कि अंग्रेजी एक ऐसी खिड़की थी जिससे दुनियाभर के आधुनिक विचार भारत में आ सकते थे। वे चाहती थीं कि बहुजन समाज वैश्विक ज्ञान से जुड़े।
सावित्रीबाई का संघर्ष केवल क्लासरूम तक सीमित नहीं था। उन्होंने देखा कि विधवाओं का शोषण हो रहा है और समाज उनके बच्चों को अपनाने को तैयार नहीं है। इसके लिए उन्होंने अपने ही घर में ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ खोला। उन्होंने दीवारों पर पोस्टर लगवाए, “गर्भवती विधवाओं, यहां आओ और सम्मान के साथ अपने बच्चे को जन्म दो।”
1897 में जब पुणे में प्लेग की महामारी फैली, तो सवर्ण डॉक्टर दलित बस्तियों में जाने से कतरा रहे थे। 66 वर्ष की आयु में भी सावित्रीबाई पीछे नहीं हटीं। एक दिन उन्हें पता चला कि मुंधवा की एक बस्ती में 10 साल का बच्चा पांडुरंग गंभीर रूप से बीमार है।
सावित्रीबाई खुद वहां पहुंचीं, बच्चे को अपनी पीठ पर लादा और दौड़ते हुए अस्पताल ले गईं। बच्चा तो बच गया, लेकिन इस सेवा के दौरान सावित्रीबाई स्वयं संक्रमण की चपेट में आ गईं। 10 मार्च 1897 को उन्होंने अंतिम सांस ली।
2 जुलाई 2025 को राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (एनआईपीसीसीडी) का आधिकारिक तौर पर नाम बदलकर सावित्रीबाई फुले राष्ट्रीय महिला एवं बाल विकास संस्थान कर दिया गया। 4 जुलाई को झारखंड की राजधानी रांची में इसके एक नए केंद्र का उद्घाटन भी किया गया।
सावित्रीबाई फुले पर एक बायोपिक भी बनी, जिसमें अभिनेत्री पत्रलेखा सावित्रीबाई फुले की भूमिका में नजर आईं। 27 मार्च को अभिनेत्री ने khabarwala24 को बताया था कि जब उन्हें इस किरदार के लिए ऑफर आया तो वे उत्साहित और चिंतित दोनों थीं।
अभिनेत्री ने बताया, “ईमानदारी से कहूं तो मैं तुरंत ही इस किरदार की ओर आकर्षित हो गई। यह सिर्फ एक ऐतिहासिक शख्सियत का किरदार निभाने के बारे में नहीं था, यह साहस की कहानी के बारे में था। जब अनंत सर और मैंने पहली बार बात की, तो मैं ऐसे महत्वपूर्ण व्यक्ति का किरदार निभाने को लेकर चिंतित थी, लेकिन उन्होंने मेरी मदद की।” इस फिल्म को अप्रैल 2025 को सिनेमाघरों में रिलीज किया गया था।
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