नई दिल्ली, 26 दिसंबर (khabarwala24)। यह कहानी है उर्दू की अजीम तरीन शख्सियत मिर्जा असदउल्ला खां की, जिनका तखल्लुस गालिब था। गालिब को किसी ने मोहब्बत का शायर कहा तो किसी ने फिलॉस्फर का तमगा दे दिया। गालिब इनके आगे थे और किसी तमगे में बंधने की जगह उन्होंने अपने इकबाल और लेखनी के पैनेपन को धार देने में जिंदगी गुजार दी। उनकी हर गजल सफ दर सफ नए जज्बात के साथ खून में बेतरतीब रवानगी भी देती है।
27 दिसंबर 1797 को आगरा में जन्मे गालिब ने हर मुद्दे पर लिखा। उन्होंने प्यार, तकरार, इजहार और जीवन दर्शन को भी लफ्जों से उकेरा। वे अपने समय से कहीं आगे की सोचते थे और नसीहतें उन्होंने काफी बख्शी।
‘उनके देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक, वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है’, उनकी यह पंक्ति उनके मिजाज और अंदाज को बयां करती है। इस पंक्ति के जरिए गालिब अपनी माशूका से कह रहे हैं कि तुम्हारे दीदार से हमें खुशी मिलती है। लेकिन जुदाई का रंजोगम दीदार की खुशी में गायब हो जाता है और तुम समझ नहीं पा रही कि मैं तुम्हारे बिना कितना तन्हा और अकेला हूं। गालिब प्यार को जबरदस्ती इजहार नहीं करना चाहते, वे चाहते तो कर भी सकते, लेकिन यहां उनकी अजीम शख्सियत सामने आती है और वे मर्यादाओं से बंधना ही सही समझते हैं।
गालिब को मर्यादाएं काफी पसंद थीं, सो उन्होंने उसे ऐसे व्यक्त किया कि लोग वाह-वाह करने से नहीं चूके। हालांकि, गालिब एक दरिया के पानी जैसे थे, जिसमें बस बहते चले जाने में भलाई समझी। ‘देखिए पाते हैं उश्शाक बूतों से क्या फैज, इक बिरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है’, यहां शायद गालिब ने तारीखों से चली आ रही परंपरा का जिक्र किया। वे कहते हैं कि उन्हें बताया गया कि आने वाला कल अच्छा है, इसलिए इजहार करना ठीक नहीं है। दूसरे शब्दों में गालिब हमें हौसला भी देते हैं कि आने वाला कल खुशियों से रौशन होगा, जिसका इंतजार हमें जाने कबसे रहा है।
वो दुनियादारी से आगे की बात भी करते हैं। जहां इंसान से इंसान के बीच दरकते रिश्तों का जिक्र है और फिक्र भी। इससे इतर भी वो चलने से गुरेज नहीं करते जो एक शायर से ज्यादा अनूठे इंसान की अहमियत और हकीकत से रूबरू कराता है। गालिब खामोश बैठे उस शख्स को भी सहलाते हैं और पूछते हैं कि क्या हुआ है, तभी तो उन्होंने लिखा, ‘दिले नादान तुम्हें हुआ क्या है, आखिर इस मर्ज की दवा क्या है, हम हैं मुश्ताक और वो बेजार, या इलाही ये माजरा क्या है।’
लेकिन जैसे-जैसे गालिब के गजलों के आगोश में गोता लगाते हैं तो सामने आता है वो शख्स जो मार्गदर्शक भी है और उपदेशक भी, जिसने दुनिया से अंधेरा दूर करने की ठान ली है। वे उम्मीद भी बंधाते हैं कि आने वाला समय अपना है, बस हौसला रखो। वो खुदा से भी लड़ते-भिड़ते लगते हैं। सही मायनों में गालिब ऐसे कुशल व्यक्तित्व थे, जिन्होंने दुनिया देखी और दुनिया में होने का अर्थ सही मायनों में समझा।
‘गालिब न कर हूजुर में तू बार-बार अर्ज, जाहिर है तेरा हाल सब उसपर कहे बगैर’, कुछ लोग इसे समझते हैं कि गालिब ने इसे प्रेमिका के लिए उकेरा है, लेकिन असल मायनों में इसे गालिब को समझने की हमारी नादानी ही कही जा सकती है। गालिब ने इन लाइनों को खुदा के शान में कागज पर उकेरा है, लेकिन उनके लिए उनका इश्क ही खुदा की सच्ची इबादत है। इसका मतलब स्पष्ट है कि इश्क काम से, तबीयत से और खुदा से भी।
हालांकि मिर्जा गालिब जैसे शायर और गजलख्वां को शब्दों में दर्ज करना हमारी हिमाकत ही कही जा सकती है। क्योंकि गालिब को समझने के लिए निजी जज्बातों से ज्यादा इंसानी रिश्तों की हकीकत समझनी होगी। अगर इंसान को समझने का हुनर आ जाए तो गालिब के शब्दों की पेचीदगी अपने आप खुलती चली जाती है।
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