श्रीनगर, 2 जनवरी (khabarwala24)। मीरवाइज उमर फारूक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक बयान जारी किया है। उन्होंने कहा कि जिस दिन उन्हें जामा मस्जिद में नमाज के दौरान लोगों को संबोधित करना चाहिए था, उस दिन वे सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी बात रखने को मजबूर हैं, क्योंकि एक बार फिर उन्हें नजरबंद कर दिया गया है।
मीरवाइज उमर फारूक ने कहा कि साल 2026 की शुरुआत भले ही उम्मीदों के साथ हो रही हो, लेकिन साल 2025 की दर्दनाक यादें अब भी लोगों के दिलो-दिमाग में ताजा हैं। बीता साल त्रासदी और अनिश्चितता से भरा रहा। पहलगाम में हुए भयावह हमले ने पूरे कश्मीर को झकझोर कर रख दिया। इस हमले की घाटी में सभी वर्गों ने एक सुर में निंदा की, लेकिन इसके बाद आम लोगों में गहरा डर और बेचैनी फैल गई। कई जगहों पर लोगों को निशाना बनाया गया और उनके घरों को तोड़ा गया।
मीरवाइज के अनुसार, कश्मीर में युद्ध खत्म नहीं हुए हैं, सिर्फ टाल दिए जाते हैं, और संवाद की कोई ठोस पहल नजर नहीं आती।
मीरवाइज उमर फारूक ने कहा कि इन घटनाओं के बीच कश्मीरियों की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है। देश के अलग-अलग हिस्सों में कश्मीरियों को संदेह और हमलों का सामना करना पड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि नई दिल्ली और कश्मीर के बीच भरोसे की खाई और गहरी हो गई है। जबरन चुप्पी को सहमति के रूप में पेश किया जा रहा है, जबकि असल में जख्म अब भी खुले हैं और समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। केंद्र शासित प्रदेश की निर्वाचित सरकार खुद को शक्तिहीन बता रही है। लोगों में निराशा का माहौल है और अपनी पहचान खोने का डर गहराता जा रहा है।
उनका कहना है कि 2019 के बाद राज्य का दर्जा खत्म होने, संवैधानिक गारंटियों के हटने और कानूनों में बदलाव के कारण जनसांख्यिकीय परिवर्तन को लेकर लोगों में गहरी चिंता है।
मीरवाइज ने बताया कि साल 2025 में अवामी एक्शन कमेटी और इत्तिहादुल मुस्लिमीन जैसे संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जो हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का हिस्सा थे और सामाजिक कार्यों, शांति और संवाद की वकालत करते थे।
उनके अनुसार, असहमति और अलग राय रखने की जगह अब लगभग खत्म हो चुकी है। राज्य से अलग कोई भी विचार रखने पर उसे ‘राष्ट्रविरोधी’ बताकर अपराध की श्रेणी में डाल दिया जाता है।
उन्होंने कहा कि आज उनके पास कोई सार्वजनिक मंच नहीं है। स्थानीय मीडिया भी लोगों की आवाज को जगह देने के लिए तैयार नहीं है। वे प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं कर सकते, बिना अनुमति कहीं जा नहीं सकते, और लोग उनसे मिलने के लिए भी इजाजत लेने को मजबूर हैं। कश्मीर की आध्यात्मिक पहचान मानी जाने वाली जामा मस्जिद तक उनकी पहुंच सीमित कर दी गई है। पिछले साल उन्हें 14 शुक्रवारों को नजरबंद रखा गया और इस साल भी लगातार ऐसा हो रहा है।
मीरवाइज ने कहा कि जब हुर्रियत से जुड़े संगठनों पर यूएपीए के तहत प्रतिबंध लगा दिया गया और सोशल मीडिया प्रोफाइल में पदनाम रखने को अवैध बताया गया, तो उनके सामने या तो संवाद का आखिरी जरिया बचाने का विकल्प था या पूरी तरह खामोश हो जाने का खतरा। इसी कारण उन्होंने सोशल मीडिया को अपनी आवाज बनाए रखा।
उन्होंने साफ कहा कि उनके विचार और विश्वास में कोई बदलाव नहीं आया है। सुरक्षा उन्हें उनके पिता की शहादत के बाद से मिल रही है और अगर उन्होंने 35 साल तक कोई समझौता नहीं किया, तो अब भी करने का कोई सवाल ही नहीं उठता।
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