‘देख तेरे संसार की हालत…’ लिखने वाला कवि खुद जीवन की सबसे कड़वी सच्चाई का बना शिकार

नई दिल्ली, 10 दिसंबर (khabarwala24)। 1943 में फिल्म ‘किस्मत’ रिलीज हो चुकी थी और देश भर के सिनेमाघरों में भीड़ उमड़ रही थी। इस फिल्म की सफलता का श्रेय इसके साहसी और क्रांतिकारी गीत को दिया जा रहा था। ‘आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है। दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा […]

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नई दिल्ली, 10 दिसंबर (khabarwala24)। 1943 में फिल्म ‘किस्मत’ रिलीज हो चुकी थी और देश भर के सिनेमाघरों में भीड़ उमड़ रही थी। इस फिल्म की सफलता का श्रेय इसके साहसी और क्रांतिकारी गीत को दिया जा रहा था। ‘आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है। दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है।’

यह गीत ब्रिटिश सेंसरशिप को चकमा देकर परदे पर गूंजा और तुरंत ही स्वतंत्रता सेनानियों के लिए एक गुप्त राष्ट्र गीत बन गया। गीत की लोकप्रियता ने फिल्म को भारत की पहली गोल्डन जुबली हिट बना दिया, लेकिन साथ ही इसके रचयिता पर ब्रिटिश हुकूमत का कहर भी टूट पड़ा।

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गीतकार कवि प्रदीप (रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी) को पता था कि उनकी कलम ने बारूद का काम किया है। उन्हें गिरफ्तारी से बचने के लिए रातोंरात भूमिगत होना पड़ा। जिस कवि का काम कागज और स्याही से था, वह अब एक क्रांतिकारी की तरह छिपकर रहने को मजबूर था। यह शायद भारतीय सिनेमा के इतिहास में किसी गीतकार के राजनीतिक प्रभाव का सबसे बड़ा प्रमाण था।

मगर, यह कहानी केवल भूमिगत जीवन और देशभक्ति की नहीं है। यह उस व्यक्ति की कहानी है, जिसकी कला ने लाखों लोगों को जगाया, जिसने प्रधानमंत्री की आंखों में आंसू ला दिए, लेकिन अंततः अपने ही जीवन में सबसे बड़ी नैतिक त्रासदी का शिकार हुआ।

कवि प्रदीप का जन्म 6 फरवरी 1915 को मध्य प्रदेश के एक छोटे से शहर बड़नगर में हुआ था। लखनऊ विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद, वह अपनी साहित्यिक महत्वाकांक्षाओं को लेकर बंबई पहुंचे।

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फिल्मी दुनिया में कदम रखने के लिए उन्होंने अपनी लंबी पहचान (रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी) को छोटा कर ‘कवि प्रदीप’ का छद्म नाम अपनाया। यह परिवर्तन केवल व्यावसायिक सुविधा नहीं थी। नाम के आगे ‘कवि’ जोड़कर, उन्होंने स्वयं को राष्ट्रीय चेतना और कविता के प्रति समर्पित एक साहित्यिक हस्ती के रूप में प्रस्तुत किया। यह पहचान ही उनके राष्ट्रवादी कार्यों की आधारशिला बनी।

1939 में, एक कवि सम्मेलन में उनकी प्रतिभा को पहचान मिली और उन्हें बॉम्बे टॉकीज में 200 रुपए प्रति माह के वेतन पर नियुक्त किया गया, जहां से उनकी लगभग छह दशकों की रचनात्मक यात्रा शुरू हुई।

प्रदीप की कलम की क्रांतिकारी धार करियर की शुरुआत में ही दिखने लगी थी। 1940 में आई फिल्म ‘बंधन’ का गीत ‘चल चल रे नौजवान’ इतना प्रेरक था कि ब्रिटिश अधिकारियों ने इस पर तत्काल प्रतिबंध लगा दिया।

फिर 1943 में ‘किस्मत’ का वह गीत आया, जिसने उन्हें भूमिगत कर दिया। ब्रिटिश सरकार द्वारा गीतों पर प्रतिबंध लगाना और गीतकार को छिपने के लिए मजबूर होना, यह सिद्ध करता है कि औपनिवेशिक प्रशासन ने उनकी कला को एक गंभीर खतरा माना।

कवि प्रदीप की विरासत का सबसे पवित्र अध्याय 27 जनवरी 1963 को लिखा गया। 1962 के भारत-चीन युद्ध में शहीद हुए सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए उन्होंने एक गीत लिखा, “ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी।’

जब लता मंगेशकर ने इस गीत को 50,000 की भीड़ के सामने गाया, तो इसकी भावनात्मक शक्ति ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को भी अश्रुपूरित कर दिया। यह गीत राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करने वाला एक सांस्कृतिक स्मारक बन गया, जिसकी तुलना आज राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के साथ की जाती है। इस गीत से होने वाली आय की एक-एक पाई वीर सैनिकों की विधवाओं के कल्याण के लिए समर्पित कर दी गई।

विडंबना यह रही कि राष्ट्रीय एकता के इस सबसे बड़े सांस्कृतिक क्षण में, इसके रचयिता कवि प्रदीप को प्रीमियर में आमंत्रित नहीं किया गया था। सामूहिक सम्मान और व्यक्तिगत उपेक्षा का यह विरोधाभास उनके जीवन भर चलता रहा।

आजादी के बाद, कवि प्रदीप ने भारतीय समाज में बढ़ते भौतिकवाद और नैतिक पतन पर तीखी आलोचना शुरू कर दी। उन्होंने फिल्म ‘नास्तिक’ (1954) में अपनी चिंता व्यक्त करते हुए एक गीत लिखा, जिसके बोल थे, “देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान।”

उनकी दार्शनिक विचारधारा फिल्म ‘संबंध’ के गीत ‘चल अकेला चल अकेला तेरा मेला पीछे छूटा’ में मुखर हुई। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया था कि यह गाना उन्होंने पैसे के लालच और समाज में उभरते दुर्गुणों से दुखी होकर लिखा था। यह अत्यंत मार्मिक है कि जिस नैतिक गिरावट की उन्होंने अपनी कला में निंदा की, वह उनके स्वयं के जीवन की कड़वी सच्चाई बन गई।

1997 में, उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान, दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया। यह उनके पांच दशकों के असाधारण योगदान की राष्ट्रीय स्वीकृति थी।

मगर, यह सर्वोच्च सम्मान उन्हें उस समय मिला, जब उनका व्यक्तिगत जीवन घोर संकट में था। पत्नी के निधन के बाद, वे स्वयं लकवाग्रस्त हो चुके थे। सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि उनकी चार संतानों, तीन बेटियां और एक बेटा ने कथित तौर पर उन्हें अकेला छोड़ दिया और उनसे कभी मिलने तक नहीं आए। जिस कवि ने मानवीय मूल्यों के ह्रास पर गीत लिखे थे, उन्हें उसी नैतिक पतन का शिकार होना पड़ा।

कोलकाता के एक व्यवसायी प्रदीप कुंडलिया ने उन्हें अपने फ्लैट में जगह दी और उनकी देखभाल करवाई। राष्ट्रीय सम्मान और व्यक्तिगत उपेक्षा का यह तीखा विरोधाभास उनकी कला की सत्यता का सबसे बड़ा प्रमाण बन जाता है।

11 दिसंबर 1998 को 83 वर्ष की आयु में कवि प्रदीप का निधन हो गया। उनका निधन तब हुआ जब उनकी विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर अंतिम मुहर लग चुकी थी। उनकी विरासत को संस्थागत रूप से संरक्षित किया गया है। 2011 में डाक टिकट और ‘राष्ट्रीय कवि प्रदीप सम्मान’ की शुरुआत की गई।

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