नई दिल्ली, 12 जनवरी (khabarwala24)। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और गंभीर आर्थिक संकट के बीच पाकिस्तान की सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियां लगातार घाटे में जा रही हैं। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, इन कंपनियों का शुद्ध घाटा 300 प्रतिशत तक बढ़ गया है, जबकि करदाताओं के पैसों से दी जाने वाली सरकारी मदद बढ़कर 2.1 ट्रिलियन रुपये (स्थानीय मुद्रा) तक पहुंच गई है।
द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के एक संपादकीय में कहा गया है कि “आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं।” रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025 में सरकारी कंपनियों का कुल राजस्व 1.4 ट्रिलियन रुपये घटकर 12.4 ट्रिलियन रुपये रह गया, वहीं कुल शुद्ध घाटा बढ़कर 122.9 अरब रुपये हो गया, जो पिछले वर्ष 30.6 अरब रुपये था।
संपादकीय में कहा गया है कि पाकिस्तान की वित्तीय बदहाली की गहराई को अगर किसी एक पैमाने से समझा जा सकता है, तो वह सरकारी कंपनियों का प्रदर्शन है। रिपोर्ट में इसे “भयानक संरचनात्मक विफलता” करार दिया गया है, जो लगातार सार्वजनिक संसाधनों को चूस रही है और आर्थिक स्थिरता को कमजोर कर रही है।
राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (नेशनल हाईवे अथॉरिटी) और बिजली वितरण कंपनियां अब भी भारी घाटे में हैं। संपादकीय के अनुसार, ये संस्थाएं लंबे समय से चली आ रही संरचनात्मक खामियों और परिचालन अक्षमताओं से जूझ रही हैं, जिन पर चर्चा तो बार-बार होती है, लेकिन ठोस सुधार के प्रयास नहीं किए जाते।
इस बीच, पाकिस्तान सरकार ऐसे ‘पेपर ग्रोथ’ वाले क्षेत्रों को बढ़ावा दे रही है, जिनसे कागजी तौर पर जीडीपी में बढ़ोतरी तो दिखती है, लेकिन वास्तविक व्यावसायिक निवेश को प्रोत्साहन नहीं मिलता। रियल एस्टेट इसका बड़ा उदाहरण है, जहां अमीर वर्ग अपनी संपत्ति पार्क कर उसे बढ़ाता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 के बाद से पाकिस्तान के सबसे गरीब 20 प्रतिशत परिवारों की वास्तविक मासिक आय में करीब 12 प्रतिशत की गिरावट आई है। इसके उलट, सबसे अमीर वर्ग की आय में 7 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है, जब देश की अर्थव्यवस्था गिरावट के दौर से गुजर रही थी, सार्वजनिक क्षेत्र के बाहर औसत वेतन घट रहा था और गरीबी तेजी से बढ़ी थी।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि आम लोगों की बचत लगभग खत्म हो चुकी है। कुल मिलाकर बचत में 66 प्रतिशत की गिरावट आई है, क्योंकि परिवार रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए अपनी जमा पूंजी खर्च करने को मजबूर हैं। इसका असर स्वास्थ्य और शिक्षा पर भी पड़ा है, जहां खर्च में 19 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, यह स्थिति देश के भविष्य के लिए बेहद चिंताजनक संकेत है।
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