नई दिल्ली, 16 मार्च (khabarwala24)। ‘यू कैन नॉट शेक हैंड्स विद अ क्लेंच्ड फिस्ट’—यानी मुट्ठी बंद हो तो हाथ नहीं मिलते। यही मशहूर कथन है इजरायल की पहली और दुनिया की तीसरी महिला पीएम गोल्डा मेयर का, जिन्होंने 70 की उम्र में 17 मार्च 1969 को देश की बागडोर संभाल इतिहास रच दिया।
यूक्रेन के कीव में जन्मी गोल्डा मेयर को इजरायल में प्यार से अक्सर ‘दादी’ कहा जाता था। उनकी छवि केवल सख्त नेता की नहीं थी, बल्कि बेबाक, सपाट और निर्णय लेने में सक्षम नेता की थी। बिना फिल्टर की सिगरेट पीने वाली चेन‑स्मोकर गोल्डा के लिए इजरायल के पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन-गुरियन कहते थे कि वह “मेरे मंत्रिमंडल की अकेली पुरुष हैं।”
70 से ज्यादा की उम्र में भी वो किसी 20 साल की युवती की तरह काम करती थीं और उनका दिन सुबह चार बजे समाप्त होता था।
गोल्डा मेयर की ये बातें उनकी आत्मकथा ‘माई लाइफ’ में लिखी हैं। इसमें लिखा है, “कभी-कभी मेरे आवास के बाहर तैनात अंगरक्षक देखते थे कि तड़के 4 बजे भी मेरी रसोई की लाइट जली हुई है। उनमें से एक ये देखने के लिए अंदर आता था कि मैं भली-चंगी तो हूं ना। मैं फिर चाय बनाती थी, हम साथ बैठकर पीते थे और अलग-अलग विषयों पर बातें करते थे जब तक मुझे नहीं लगता था कि अब मुझे सोने जाना चाहिए।”
गोल्डा मेयर के विचार हमेशा स्पष्ट और कट्टर रहते थे। उन्होंने एक बार कहा था, “अगर शांति आई तो हम अरब को माफ भी कर सकते हैं कि उन्होंने हमारे बेटों की हत्या की, लेकिन इस बात के लिए हम उन्हें कभी माफ नहीं कर सकते कि उन्होंने हमें अरब के बेटों की हत्या करने के लिए मजबूर किया।” यह बयान मध्य-पूर्व संघर्ष में उनकी दृढ़ मानसिकता और कठोर राजनीतिक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
भारत के साथ उनका रिश्ता भी ऐतिहासिक और दिलचस्प रहा। 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान गोल्डा मेयर ने भारत को गुपचुप तरीके से सैन्य सहायता मुहैया कराई। उस समय दुनिया की दूसरी और भारत की पहली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं। दोनों के बीच व्यक्तिगत सम्मान और संवाद का रिश्ता अच्छा खासा था, लेकिन भारत उस दौर में आधिकारिक रूप से इजरायल से दूरी बनाए रखता था, फिर भी जब जरूरत पड़ी तो गोल्डा ने पूरी मदद की।
अमेरिकी पत्रकार गैरी जे. बास ने अपनी किताब ‘द ब्लड टेलीग्राम: निक्सन, किसिंजर, एंड ए फॉरगॉटन जेनोसाइड’ में लिखा कि गोल्डा मेयर ने इजरायली हथियार विक्रेता शलोमो जब्लोडिकिज के माध्यम से भारत को कुछ हथियार और मोर्टार भिजवाए थे। इस दौरान कुछ इजरायली प्रशिक्षक भी भारत आए थे। यह कदम उस समय भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था और पूरी तरह गुप्त रखा गया।
प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल चुनौतियों से भरा रहा। 1973 में अरब देशों और इजरायल के बीच हुआ योम किप्पुर युद्ध उनके नेतृत्व की सबसे कठिन परीक्षा बन गया। युद्ध के शुरुआती दिनों में इजरायल को भारी नुकसान और चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन गोल्डा ने स्थिति संभाली और दृढ़ नेतृत्व का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने एक बार कहा था, “पीस विल कम व्हेन द अरब्स लव देयर चिल्ड्रेन मोर दैन दे हेट अस” (यानी उसी दिन शांति का राज होगा जब अरब वासी हमसे घृणा करने के बजाए अपने बच्चों को ज्यादा प्यार करेंगे); यह भी उनकी स्पष्ट और लोहे सी ताकत वाली शख्सियत को दर्शाता है।
गोल्डा मेयर ने 1974 में प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, लेकिन आज भी उन्हें इजरायल की सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता है। उनका व्यक्तित्व, साहस, स्पष्टवादिता और भारत के साथ गुप्त सहयोग ने उन्हें वैश्विक राजनीति में विशेष स्थान दिलाया। उनके जीवन में कठोरता, मानवता और बेबाक निर्णय लेने की शक्ति का अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है, जो उन्हें आज भी ‘दादी’ और ‘आयरन लेडी ऑफ इजरायल’ के रूप में यादगार बनाता है।
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