ढाका, 20 जनवरी (khabarwala24)। बांग्लादेश की राजनीति अब भी पुरुष-प्रधान बनी हुई है। पितृसत्तात्मक सामाजिक ढांचे के कारण महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी हतोत्साहित होती है, जिसका नतीजा यह है कि राजनीतिक दलों के सभी स्तरों पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व बेहद कम बना हुआ है। यह बात एक रिपोर्ट में सामने आई है।
बांग्लादेश के प्रमुख दैनिक प्रथम आलो में लिखते हुए संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट ऑफिस (एचडीआरओ) के पूर्व निदेशक सलीम जहान ने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए बताया कि 12 फरवरी को होने वाले चुनावों के लिए कुल 2,568 नामांकन पत्र दाखिल किए गए हैं, जिनमें केवल 109 महिला उम्मीदवार हैं। यह कुल उम्मीदवारों का महज 4.2 प्रतिशत है।
उन्होंने बताया कि इन महिला उम्मीदवारों में से 72 को राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त है, जबकि 37 महिलाएं निर्दलीय उम्मीदवार हैं। इसका अर्थ यह है कि हर तीन में से एक महिला उम्मीदवार को किसी भी पार्टी का समर्थन नहीं मिला है।
रिपोर्ट के अनुसार, आगामी चुनावों में बांग्लादेश की कुल 50 राजनीतिक पार्टियां हिस्सा ले रही हैं, जिनमें से 30 पार्टियों ने एक भी महिला उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा है। यानी देश की तीन-पांचवीं राजनीतिक पार्टियों ने किसी भी योग्य महिला को टिकट नहीं दिया, जबकि बांग्लादेश की कुल आबादी का आधे से अधिक हिस्सा महिलाएं हैं। रिपोर्ट ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है।
जिन पार्टियों ने महिला उम्मीदवार उतारे हैं, उनमें बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और मार्क्सवादी बांग्लादेश सोशलिस्ट पार्टी (बीएसपी) सबसे ऊपर हैं, लेकिन दोनों ने ही केवल 10-10 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जमीनी स्तर पर मजबूत मानी जाने वाली बीएनपी द्वारा अपने 328 उम्मीदवारों में से सिर्फ 10 महिलाओं (करीब 3 प्रतिशत) को शामिल करना बेहद निराशाजनक है।
इसके अलावा, कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी ने आगामी चुनावों के लिए अपने 279 उम्मीदवारों में से एक भी महिला को टिकट नहीं दिया है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि राजनीतिक दलों के बीच चुनावों में कम से कम पांच प्रतिशत महिला उम्मीदवार उतारने पर सहमति बनी थी, लेकिन अधिकांश दल इस प्रतिबद्धता को पूरा करने में विफल रहे हैं।
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि बांग्लादेश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी अब भी बेहद सीमित है। बहुत कम महिलाएं सक्रिय रूप से राजनीति में शामिल होती हैं। इसके चलते चुनावों में महिला उम्मीदवारों की संख्या कम रहती है, वे रैलियों और प्रचार अभियानों में भी कम दिखाई देती हैं। समाज महिलाओं को इन भूमिकाओं में देखने का आदी नहीं है। साथ ही, चुनावों में पारंपरिक रूप से इस्तेमाल होने वाली ‘मसल पावर’ की राजनीति भी महिलाओं को उम्मीदवार बनने से हतोत्साहित करती है।
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