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मृणालिनी साराभाई: भारत की प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्यांगना, जिनके नृत्य की हर मुद्रा कहती थी एक कहानी

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नई दिल्ली, 20 जनवरी (khabarwala24)। 21 जनवरी सिर्फ एक तारीख नहीं है, क्योंकि इसी दिन साल 2016 में भारतीय कला जगत को गहरा सदमा लगा था। इसी दिन 97 वर्ष की उम्र में महान नृत्यांगना और कोरियोग्राफर मृणालिनी साराभाई का निधन हो गया था, लेकिन उनके जीवन और कलात्मक योगदान की गूंज आज भी हर नृत्यप्रेमी के दिल में जीवित है। मृणालिनी साराभाई सिर्फ एक कलाकार नहीं थीं, वह नृत्य और कला की जीवन्त आत्मा थीं, जिनके हर अंग में नृत्य बसा था। उनका कहना था, “डांस मेरी सांस है, मेरा राग।”

मृणालिनी का जन्म 11 मई 1918 को केरल में हुआ था, लेकिन उनका जीवन अहमदाबाद के साथ गहरे रूप से जुड़ा है। उनका बचपन स्विट्जरलैंड में बीता, जहां उन्होंने डेलक्रूज स्कूल से पश्चिमी नृत्यकला की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद शांति निकेतन में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के सानिध्य में शिक्षा ग्रहण की। अमेरिका में कुछ समय बिताने के बाद, वे भारत लौटकर भरतनाट्यम और कथकली जैसी शास्त्रीय नृत्यकला में प्रशिक्षित हुईं। मीनाक्षी सुंदरम पिल्लई से भरतनाट्यम और थाकाज़ी कुंचू कुरुप से कथकली सीखने के बाद मृणालिनी ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य की विविध विधाओं में अपनी महारत स्थापित की।

उनके परिवार में कला और स्वतंत्रता संग्राम की गहरी जड़ें थीं। उनकी शादी प्रसिद्ध वैज्ञानिक और भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई से हुई। उनके पिता डॉ. स्वामीनाथन बैरिस्टर थे और मां, अम्मु स्वामीनाथन, जानी-मानी स्वतंत्रता सेनानी थीं। उनकी बड़ी बहन, कैप्टन लक्ष्मी सहगल, सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फौज की महिला सेना, झांसी रेजिमेंट, की कमांडर-इन-चीफ थीं। उनके बड़े भाई गोविंद स्वामीनाथन भी बैरिस्टर थे। उनकी शादी प्रसिद्ध वैज्ञानिक और भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई से हुई थी।

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मृणालिनी साराभाई का जीवन नृत्य और कोरियोग्राफी के प्रति समर्पित रहा। उन्होंने ‘दर्पणा एकेडमी’ की स्थापना की। इस एकेडमी से अठारह हजार से अधिक छात्र भरतनाट्यम और कथकली में प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं। उनके निर्देशन में कठपुतली, संगीत, नाटक, मार्शल आर्ट और विभिन्न स्वदेशी वाद्य यंत्रों का प्रशिक्षण भी दिया जाता था। मृणालिनी की यह सोच कि कला केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा है, उनके शिक्षण और कोरियोग्राफी में साफ झलकती थी।

उनकी पहली कथकली प्रस्तुति दिल्ली में दी गई, जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी मौजूद थे। नेहरू ने उन्हें मंचन के बाद बधाई दी थी। उनके द्वारा मंचित ‘मनुष्य’ नाटक ने भारतीय रंगमंच और नृत्य जगत में नया आयाम जोड़ा। मृणालिनी ने न केवल नृत्य में महारत हासिल की, बल्कि लेखन, कविता और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में भी गहरी छाप छोड़ी। उनकी आत्मकथा ‘मृणालिनी साराभाई: द वॉयस ऑफ द हार्ट’ में उनके जीवन और कला के प्रति समर्पण का स्पष्ट प्रमाण मिलता है।

मृणालिनी का योगदान सामाजिक क्षेत्र में भी अद्वितीय रहा। मृणालिनी साराभाई ने गुजरात हैंडलूम कॉरपोरेशन और नेहरू फाउंडेशन की अध्यक्षता की। उन्होंने सर्वोदय इंटरनेशनल की ट्रस्टी के रूप में गांधीजी के विचारों को प्रचारित किया। समाज में रूढ़िवादिता और भेदभाव के खिलाफ उनकी आवाज स्पष्ट और निर्भीक थी। उन्होंने समय-समय पर विभिन्न मंचों से सामाजिक मुद्दों को उजागर किया और कला को सामाजिक चेतना के एक माध्यम के रूप में प्रयोग किया।

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मृणालिनी साराभाई की बेटी मल्लिका साराभाई भी प्रसिद्ध नृत्यांगना और समाजसेवी हैं, जो अपनी मां की विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। मृणालिनी ने अपने जीवन में यह दिखाया कि कला और जीवन के बीच का अंतर केवल शब्दों में नहीं, बल्कि भावनाओं और अनुभवों में मापा जा सकता है। उनके योगदान ने न केवल भारतीय शास्त्रीय नृत्य को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई, बल्कि नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बना।

मृणालिनी ने अपने पूरे जीवन में नृत्य को ही अपना जीवन माना। उनके काम और योगदान को देखकर भारत सरकार ने उन्हें 1965 में पद्मश्री और 1992 में पद्मभूषण से सम्मानित किया। इसके अलावा, उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले।

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