वाराणसी, 16 मार्च (khabarwala24)। आदि शक्ति की आराधना को समर्पित पर्व चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से प्रारंभ हो रहा है। देश-दुनिया में माता के कई दिव्य धाम हैं, जहां वह कई रूप में निवास करती हैं। ऐसा ही एक दिव्य धाम देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में स्थित है, जो 51 शक्तिपीठों में से एक है। पौराणिक मान्यता है कि काशी में भगवती सती का कर्णकुंडल गिरा था।
जहां-जहां देवी सती के शरीर के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए। काशी में भगवती सती का कर्णकुंडल यानी कान का आभूषण गिरा था, इसलिए यह पावन स्थान मां विशालाक्षी धाम के नाम से जाना जाता है। आम दिनों के साथ ही नवरात्रि और कुछ अन्य विशेष दिनों में यहां मां के दर्शन और आराधना का विशेष महत्व है।
उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के अनुसार, विशालाक्षी देवी मंदिर वाराणसी का एक प्रमुख शक्तिपीठ है। यह मंदिर शिव और शक्ति की संयुक्त आराधना का अनुपम केंद्र है। सदियों से यह धाम आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है। चैत्र नवरात्रि के शुभ अवसर पर मां विशालाक्षी के दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए श्रद्धालु आते हैं। भक्त दूर-दूर से यहां पहुंचकर मां का आशीर्वाद लेते हैं। चैत्र नवरात्रि, वासंतिक नवरात्रि या गुप्त नवरात्रि हर अवसर पर यहां मां की आराधना होती है।
आदि शक्ति मां के 51 शक्तिपीठों में से एक विशालाक्षी शक्तिपीठ वाराणसी के दशाश्वमेध घाट के मीरघाट में स्थित है। यह पवित्र धाम मणिकर्णिका घाट से कुछ दूरी पर है। इस मंदिर को मां विशालाक्षी गौरी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। काशी में विशालाक्षी मंदिर भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। खास बात है कि मंदिर से काशी विश्वनाथ मंदिर और अन्नपूर्णा मंदिर भी ज्यादा दूर नहीं हैं।
माता विशालाक्षी का यह मंदिर दक्षिण भारतीय शैली में बना है। इतिहासकारों के अनुसार इसका पुनर्निर्माण विजयनगर साम्राज्य के शासकों ने करवाया था। आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में यहां श्रीयंत्र स्थापित किया था। 1908 में दक्षिण भारतीय भक्तों ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान देखकर देवी सती ने आत्मदाह कर लिया। क्रोधित होकर भगवान शिव सती का शरीर कंधे पर उठाकर पूरे ब्रह्मांड में घूमने लगे। देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित कर दिया। जहां-जहां सती के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ बने। वाराणसी में कर्णफूल गिरने से यह स्थान विशालाक्षी शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। इस शक्तिपीठ के समीप काल भैरव भी विराजमान हैं।
विशालाक्षी मंदिर में मां की दो प्रतिमाएं हैं, एक चल (चलने वाली) और दूसरी अचल (स्थिर)। दोनों की पूजा-अभिषेक समान रूप से होती है। मां विशालाक्षी की श्याम रंग की प्रतिमा मनमोहक है। वहीं, चल मूर्ति की विशेष पूजा नवरात्रि के दौरान विजयादशमी के दिन घोड़े पर सवार करके की जाती है। अचल मूर्ति की विशेष पूजा साल में दो बार होती है, पहली भादों मास की कृष्ण पक्ष की तृतीया (कजरी तीज) को मां के जन्मोत्सव के रूप में और दूसरी दीपावली के दूसरे दिन अन्नकूट के रूप में। मंदिर में दक्षिण भारतीय पूजा पद्धति भी अपनाई जाती है। दक्षिण भारत से बड़ी संख्या में भक्त माता के दर्शन करने आते हैं।
कैंट रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी लगभग 3 से 5 किलोमीटर है। मंदिर जाने के लिए गौदौलिया या दशाश्वमेध का पब्लिक व्हीकल या कैब बुक कर पहुंचा जा सकता है। वहीं, लाल बहादुर शास्त्री इंटरनेशनल एयरपोर्ट (बाबतपुर एयरपोर्ट) से मंदिर की दूरी लगभग 27 किलोमीटर है।
Breaking News in Hindi और Latest News in Hindi सबसे पहले मिलेगी आपको सिर्फ Khabarwala24 पर. Hindi News और India News in Hindi से जुड़े अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें Facebook पर ज्वॉइन करें, Twitter पर फॉलो करें और Youtube Channel सब्सक्राइब करे।


