नई दिल्ली, 22 फरवरी (khabarwala24)। भारत के हर मंदिर में स्वयंभू प्रतिमा या फिर स्थापित प्रतिमा की पूजा की जाती है। कुछ प्राचीन मंदिरों में पेड़ के नीचे मौजूद शिलाओं का भी पूजन होता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उत्तराखंड की देव भूमि पर एक ऐसा मंदिर मौजूद है, जहां किसी प्रतिमा को नहीं, बल्कि अस्थियों को पूजा जाता है?
ये बात हैरान कर सकती है लेकिन सच है। हम बात कर रहे हैं कार्तिक स्वामी मंदिर की, जो त्याग, प्रेम और समर्पण का प्रतीक है।
कार्तिक स्वामी मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में रुद्रप्रयाग-पोखरी मार्ग पर कनकचौरी गांव के पास स्थित है। कनकचौरी गांव से लगभग 3 किलोमीटर की आसान पैदल यात्रा आपको कार्तिक स्वामी मंदिर की मनमोहक सुंदरता तक ले जाती है। पहाड़ की चोटी पर होने की वजह से भक्तों को ट्रेकिंग के जरिए लंबी यात्रा करके मंदिर तक पहुंचना होता है। यात्रा के दौरान पहाड़ से उत्तराखंड किसी स्वर्ग की तरह लगता है। वैसे तो मंदिर में सावन और शिवरात्रि के समय अनुष्ठान और पूजा का आयोजन होता है, लेकिन दुर्गम रास्तों की वजह से मंदिर में पर्यटकों और श्रद्धालुओं की संख्या घटती-बढ़ती रहती है।
कार्तिक स्वामी मंदिर को लेकर कई पौराणिक किंवदंतियां मौजूद हैं। माना जाता है कि दक्षिण की धरती पर राज करने वाले कार्तिकेय भगवान गणेश के साथ हुई प्रतिस्पर्धा से आहत होकर कार्तिकेय पहाड़ियों पर चले आए और अपने पिता भगवान शिव और मां पार्वती को प्रेम, त्याग और समर्पण का सबूत देते हुए अपना शरीर त्याग दिया था। यही कारण है कि मंदिर में किसी की प्रतिमा नहीं है, बल्कि प्राकृतिक रूप से बनी शिला है, जिसे भगवान कार्तिकेय की अस्थियों के रूप में पूजा जाता है।
कार्तिक स्वामी मंदिर का इतिहास 200 साल पुराना बताया जाता है। मंदिर भले ही छोटा है, लेकिन भक्तों की आस्था दुर्गम रास्तों को भी आसान बना देती है। मंदिर की सबसे खास बात है शाम की आरती। शाम की आरती के समय मंदिर में एक साथ बहुत सारी घंटियां बजाई जाती हैं, और घंटियों की ध्वनि से पूरा पहाड़ शिव के रंग में रंग जाता है। हालांकि बर्फबारी के मौसम में थोड़ी सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है और मंदिर साल भर खुला रहता है।
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