जयपुर, 26 जनवरी (khabarwala24)। दिल्ली के कर्तव्य पथ पर सोमवार को आयोजित 77वें गणतंत्र दिवस परेड में राजस्थान की झांकी दर्शकों के लिए प्रमुख आकर्षणों में से एक बनकर उभरी।
बीकानेर की विश्व प्रसिद्ध उस्ता कला पर आधारित इस झांकी ने अपने अद्वितीय शिल्प कौशल, सांस्कृतिक वैभव और जीवंत दृश्य प्रस्तुति के माध्यम से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
झांकी के अगले हिस्से में एक कलाकार की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई थी, जो 180 डिग्री तक घूम सकती थी और पारंपरिक लोक वाद्ययंत्र रावणहत्था का वादन करती हुई दिखाई दी। रावणहत्था राजस्थान के सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित लोक वाद्ययंत्रों में से एक माना जाता है, जिसने झांकी को पारंपरिक संगीत की आत्मा से जोड़ दिया।
झांकी के दोनों ओर उस्ता कला से सजी सुंदर सुराही (पानी के घड़े), फ्लास्क और लैंप को सजावटी फ्रेम में दिखाया गया था, जो विशेष ध्यान आकर्षित कर रहे थे। झांकी का यह हिस्सा लगभग 13 फीट ऊंचा था।
ट्रेलर सेक्शन में उस्ता कला से सुसज्जित एक घूमती हुई पारंपरिक फ्लास्क को दर्शाया गया, जिसके साथ कारीगरों को हस्तशिल्प कार्य करते हुए दिखाया गया। इन दृश्यों के माध्यम से उस्ता कला की जीवंत परंपरा, मेहनत और कौशल को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया, जिससे दर्शक इस शिल्प की गहराई और ऐतिहासिक महत्ता को समझ सके।
झांकी के पीछे एक विशाल ऊंट और ऊंट सवार की प्रतिमा स्थापित की गई थी, जो राजस्थान के रेगिस्तानी परिदृश्य, लोक जीवन और शौर्यपूर्ण विरासत का प्रतीक थी। झांकी के दोनों ओर बने मेहराबों को जटिल पत्तीदार सोने के कार्य से सजाया गया था, जिसने इसकी भव्यता और दृश्य आकर्षण को और भी बढ़ा दिया।
इस भव्य प्रस्तुति में चार चांद लगाते हुए झांकी के चारों ओर गैर-लोक नृत्य प्रस्तुत करने वाले कलाकारों ने रंग-बिरंगे परिधानों में सजीव नृत्य प्रस्तुत किया। नृत्य, संगीत और परंपरा के इस गतिशील संगम ने राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत रूप में कर्तव्य पथ पर प्रस्तुत किया।
कुल मिलाकर राजस्थान की यह झांकी पारंपरिक कला, लोक संस्कृति और शाही विरासत का एक सजीव संगम साबित हुई, जिसे दर्शकों और गणमान्य अतिथियों से व्यापक प्रशंसा प्राप्त हुई। इसकी भव्यता और कलात्मक उत्कृष्टता ने राष्ट्रीय मंच पर राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
बता दें कि उस्ता कला एक पारंपरिक शाही स्वर्ण जड़ाई शिल्प है, जिसका प्रारंभिक उपयोग ऊंट की खाल पर किया जाता था। माना जाता है कि इस कला की उत्पत्ति ईरान में हुई और यह मुगल काल के दौरान भारत पहुंची। महाराजा राय सिंह के शासनकाल में यह कला बीकानेर आई, जहां स्थानीय कारीगरों ने इसे एक विशिष्ट क्षेत्रीय पहचान प्रदान की।
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