नई दिल्ली, 19 जनवरी (khabarwala24)। पूरे देश में 23 जनवरी को बसंत पंचमी पर ज्ञान की देवी मां सरस्वती को पूजने का त्योहार मनाया जाता है।
एक तरफ जहां पूरे देश में सभी भक्त मां सरस्वती की वंदना में लीन होंगे, वहीं दूसरी तरफ झारखंड के देवघर में बाबा के तिलकोत्सव का जश्न मनाया जाता है। बसंत पंचमी के दिन मंदिर में विशेष रूप से महिला भक्त भगवान शिव को बारात का न्योता देती हैं। यह सिलसिला शिवरात्रि तक चलता है।
12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, बाबा बैद्यनाथ मंदिर अपनी कई विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर में हर साल शिवरात्रि और सावन में विशेष अनुष्ठान होते हैं, लेकिन बसंत पंचमी के दिन बाबा की शादी से जुड़ी विशेष परंपरा को पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ निभाया जाता है। बसंत पंचमी के दिन बाबा का तिलकोत्सव होता है। यह बाबा की शादी की पहली रस्म होती है, जिसमें मिथिलांचल के लोग, जो खुद को मां पार्वती के पक्ष का मानते हैं, मिष्ठान से लेकर फूल-माला लेकर बड़ी संख्या में मंदिर पहुंचते हैं।
पहले बाबा की पूजा शुरू होती है और फिर बेल पत्रों और फूलों से सजाया जाता है। बाबा को तिल और मिष्ठान का भोग लगाकर गर्भगृह में महिलाएं एकत्रित होती हैं।
तिलकोत्सव में बाबा पर विशेष रूप से धान की बाली, लड्डू, घी और लाल गुलाल चढ़ाया जाता है। माना जाता है कि ये परंपरा त्रेता युग से चली आई है और आज भी हर साल माघ शुक्ल की पंचमी को इस रस्म को पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जाता है। कहा जाता है कि पहले संत और ऋषि मुनी इस परंपरा का निर्वाह करते थे, लेकिन अब आम जन भी ‘तिलकहरु’ बनकर बाबा का तिलक करने पहुंचते हैं।
12 ज्योतिर्लिंग में से एक बाबा बैद्यनाथ को मनोकामना शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, यहां मां सती का हृदय गिरा था, और यही वजह है कि इस स्थल को मां पार्वती और भगवान शिव का मिलन स्थल भी कहा जाता है। भक्त हर साल लाखों की संख्या में बाबा बैद्यनाथ मंदिर में दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं।
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