नई दिल्ली, 30 नवंबर (khabarwala24)। भारत इलेक्ट्रॉनिक टॉय का एक बढ़ता हुआ बाजार है और भारतीय टॉय इंडस्ट्री इकोसिस्टम के निर्माण में इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी सेक्टर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यह जानकारी एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी की ओर से दी गई।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव अमितेश कुमार सिन्हा ने कहा कि उन्हें इस बात की खुशी है कि इसके लिए मजबूत आधारशिला तैयार हो रही है और इंजीनियरों की अगली पीढ़ी इस दिशा में काम कर रही है।
भारत में अब घरेलू स्तर पर बड़ी मात्रा में टॉय की मैन्युफैक्चरिंग हो रही है और 153 देशों को निर्यात हो रहा है।
टॉय उद्योग को बढ़ावा देने के लिए, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, सी-डैक, भारतीय खिलौना उद्योग और लेगो समूह ने इंजीनियरिंग स्नातकों के दूसरे बैच का दीक्षांत समारोह मनाया, जिन्होंने ‘उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं (खिलौना उद्योग) के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी-आधारित नियंत्रण एवं स्वचालन समाधानों का विकास’ परियोजना के तहत एक वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त किया है।
यह परियोजना मंत्रालय के अनुसंधान एवं विकास समूह की एक विशेष पहल है जिसका उद्देश्य प्रोटोटाइप विकसित करके और कम प्रतिनिधित्व वाले समुदायों सहित युवा इंजीनियरों को ऐसे खिलौने डिजाइन करने के लिए आवश्यक कौशल से लैस करके भारतीय इलेक्ट्रॉनिक खिलौना उद्योग के विकास को बढ़ावा देना है।
सी-डैक, नोएडा में स्थापित ‘इलेक्ट्रॉनिक टॉयज लैब’ का उद्घाटन करते हुए, सिन्हा ने कहा कि इस कार्यक्रम को और बड़े पैमाने पर औपचारिक रूप दिया जा सकता है जिससे अधिक छात्रों को सुविधा हो और खिलौना उद्योगों के समग्र प्रचार में अधिक प्रभाव पड़े।
सिन्हा ने आगे कहा, “ई-खिलौनों के लिए सी-डैक-नोएडा में स्थापित उत्कृष्टता केंद्र में एनआईईएलआईटी, एमएसएच और इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों पर केंद्रित अन्य संस्थानों को शामिल किया जाएगा। इससे उद्यमिता/स्टार्टअप बनाने में मदद मिलेगी।”
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय पहल के तहत, पूरे भारत से एससी/एसटी और एनईआर पृष्ठभूमि के युवा इंजीनियरों का चयन किया गया और उन्हें एक वर्ष के लिए अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों में लगाया गया। पहले छह महीने तक उन्हें सी-डैक-नोएडा में ई-खिलौना लैब में काम करने और सीखने का अनुभव प्राप्त हुआ। इसके बाद उद्योग की जरूरतों के आधार पर खिलौनों के प्रोटोटाइप बनाने के लिए उद्योग में छह महीने का प्रशिक्षण दिया गया।
प्रतिभागियों को एक वर्ष के लिए 25,000 रुपए का मासिक वजीफा दिया गया।
Source : IANS
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