सोमनाथ, 11 जनवरी (khabarwala24)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनियाभर के श्रद्धालुओं को ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि एक सुखद संयोग है कि आज सोमनाथ मंदिर की स्वाभिमान यात्रा के एक हजार साल पूरे हो रहे हैं। साथ ही 1951 में हुए इसके पुनर्निर्माण के 75 साल भी पूरे हो रहे हैं। उन्होंने का कि ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ एक हजार साल पहले हुए विध्वंस के स्मरण के लिए ही नहीं है। ये पर्व हजार साल की यात्रा का पर्व है। ये हमारे भारत के अस्तित्व और अभिमान का पर्व भी है।
गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर के ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सोमनाथ का इतिहास विनाश और पराजय का इतिहास नहीं है, यह विजय और पुनर्निमाण का है। यह हमारे पूर्वजों के पराक्रम, त्याग और बलिदान का इतिहास है। आक्रांता आते रहे लेकिन हर युग में सोमनाथ फिर से स्थापित होता रहा, दुनिया के इतिहास में ऐसा उदाहरण मिलना मुश्किल है।
उन्होंने कहा, “एक हजार साल पहले इसी जगह पर हमारे पुरखों ने जान की बाजी लगा दी थी। अपनी आस्था, अपने विश्वास और भगवान शिव के लिए उन्होंने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। हजार साल पहले वे आततायी सोच रहे थे कि उन्होंने हमें जीत लिया, लेकिन आज एक हजार साल बाद भी सोमनाथ महादेव के मंदिर पर फहरा रही ध्वजा पूरी सृष्टि का आह्वान कर रही है कि हिंदुस्तान की शक्ति क्या है, उसका सामर्थ्य क्या है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “जब गजनी से लेकर औरंगजेब तक तमाम आक्रांता सोमनाथ पर हमला कर रहे थे, तो उन्हें लग रहा था कि उनकी तलवार सनातन सोमनाथ को जीत रही है। वे मजहबी कट्टरपंथी यह नहीं समझ पाए कि जिस सोमनाथ को वे नष्ट करना चाहते हैं, उसके नाम में ही ‘सोम’ अर्थात् ‘अमृत’ जड़ा हुआ है। उसमें हलाहल को पीकर भी अमर रहने का विचार जुड़ा है। उसके भीतर सदाशिव महादेव के रूप में वह चैतन्य शक्ति प्रतिष्ठित है जो कल्याणकारी भी है और ‘प्रचंड तांडव: शिव:’ शक्ति का स्रोत भी है।”
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि सोमनाथ में विराजमान महादेव उनका एक नाम मृत्युंजय भी है, मृत्युंजय जिसने मृत्यु को भी जीत लिया, जो स्वयं काल स्वरूप है। सोमनाथ का इतिहास विनाश और पराजय का इतिहास नहीं है। ये इतिहास विजय और पुनर्निर्माण का है।
उन्होंने कहा कि यह समयचक्र है, सोमनाथ को ध्वस्त करने की मंशा लेकर आए मजहबी आक्रांता आज इतिहास के कुछ पन्नों में सिमट कर रह गए हैं और सोमनाथ मंदिर उसी विशाल समुद्र के किनारे गगनचुंबी धर्मध्वजा को थामे खड़ा है।
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