हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला से शुरू हुई एक खास बाइक यात्रा के जरिए स्पेशल फ्रंटियर फोर्स के दो पूर्व सैनिक पूरे भारत में लोगों को जागरूक कर रहे हैं। लोडो पलदेन और जामयांग तेनजिन तिब्बत की सांस्कृतिक पहचान की रक्षा, चीन के कब्जे के खिलाफ आवाज और भारत के प्रति आभार व्यक्त करने का संदेश लेकर 28 राज्यों का भ्रमण कर रहे हैं। यह यात्रा 10 दिसंबर को शुरू हुई और मार्च 2026 में दिल्ली में समाप्त होगी।
यात्रा की शुरुआत और उद्देश्य
लोडो पलदेन और जामयांग तेनजिन दोनों स्पेशल फ्रंटियर फोर्स में सेवा दे चुके हैं। सेवानिवृत्ति के बाद लोडो पलदेन क्षेत्रीय तिब्बती युवा कांग्रेस बीर के अध्यक्ष रह चुके हैं, जबकि जामयांग तेनजिन आरटीवाईसी डेकीलिंग के सदस्य हैं। उन्होंने बताया कि यह यात्रा युवा केंद्रित अभियान है, जिसमें दलाई लामा के 90वें जन्मदिवस को करुणा वर्ष के रूप में मनाते हुए लोगों तक चार मुख्य संदेश पहुंचाए जा रहे हैं:
- करुणा का सम्मान करना
- भारत के प्रति हार्दिक धन्यवाद व्यक्त करना
- तिब्बती पहचान पर चीन के हमलों के खिलाफ चेतावनी देना
- तिब्बत की सच्ची ऐतिहासिक स्थिति को स्वीकार करने की भारत से अपील करना
भारत ने तिब्बतियों को दी शरण और सुरक्षा
पूर्व सैनिकों ने कहा कि 1959 में चीन के तिब्बत पर आक्रमण और कब्जे के बाद तिब्बती शरणार्थी भारत आए। तब से 65 साल से ज्यादा समय बीत चुका है। इस दौरान भारत ने तिब्बतियों को सुरक्षा, सम्मान और स्वतंत्रता दी। भारत सरकार और जनता ने तिब्बती संस्कृति, भाषा, धर्म और पहचान को संरक्षित करने में पूरा सहयोग किया।
उन्होंने चिंता जताई कि चीन छोटे बच्चों को जबरन बोर्डिंग स्कूलों में डालकर उनकी मातृभाषा, संस्कृति और धर्म से दूर कर रहा है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों को परिवार से अलग किया जा रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ी तिब्बती पहचान से कट जाए।
भारत की सीमा तिब्बत से लगती है, चीन से नहीं
लोडो पलदेन और जामयांग तेनजिन ने स्पष्ट कहा कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से भारत की उत्तरी सीमा तिब्बत से जुड़ी हुई है। सीमा पर तनाव सिर्फ तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद शुरू हुआ। उनका कहना है कि तिब्बत चीन का हिस्सा नहीं, बल्कि एक कब्जा किया हुआ क्षेत्र है।
28 राज्यों में बाइक से संदेश पहुंचाएंगे
दोनों पूर्व सैनिक बाइक पर सवार होकर देश के 28 राज्यों में जाएंगे। हाल ही में वे हापुड़ पहुंचे, जहां स्थानीय लोगों से मुलाकात कर संदेश दिया। देहरादून से आगे की यात्रा शुरू करने के बाद वे देर रात बरेली पहुंचे और विश्राम किया। मार्च में यह यात्रा दिल्ली में पूरी होगी।
यह यात्रा न सिर्फ तिब्बती मुद्दे को उजागर कर रही है, बल्कि भारत-तिब्बत के गहरे रिश्ते को भी याद दिला रही है।
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